अनावृतबीजी भाग – 2

बेनीटिटेलीज़ या साइकाडिऑइडेलीज़ (Bennettitales or Cycadeoidales) गण

इसको दो कुलों में विभाजित किया गया है :
(1) विलियमसोनियेसिई (Williamsoniaecae) और
(2) साइकाडिऑइडेसिई (Cycadeoidaceae).
बिलियमसोनियेसिई कुल का सबसे अधिक अच्छी तरह समझा हुआ पौधा विलियमसोनिया सीवार्डियाना (Williamsonia sewardiana) का रूपकरण (reconstruction) भारत के प्रख्यात वनस्पति विज्ञानी स्व. बीरबल साहनी ने किया है। इसके तने को बकलैंडिया इंडिका (Bucklandia indica) कहते हैं। इसमें से कहीं कहीं पर शाखाएँ निकलती थीं, जिनमें प्रजनन हेतु अंग पैदा होते थे। मुख्य तने तथा शाखा के सिरों पर बड़ी पत्तियों का समूह होता है, जिसे टाइलोफिलम कटचेनसी (Tilophyllum cutchense) कहते हैं। नर तथा मादा फूल भी इस क्रम में रखे गए हैं जिनमें विलियमसोनिया स्कॉटिका (Williamsonia scotica) तथा विलियम स्पेक्टेबिलिस (W. spectabilis), विलियम सैंटेलेंसिस (W. santalensis) इत्यादि हैं। इसके अतिरिक्त विलियमसोनिएला (Williamsoniella) नामक पौधे का भी काफी अध्ययन किया गया है।
साइकाडिआइडेसी कुल में मुख्य वंश साइकाडिआइडिया (Cycadeoidea), जिसे बेनीटिटस (Bennettitus) भी कहते हैं, पाया जाता था। करोड़ों वर्ष पूर्व पाए जानेवाले इस पौधे का फ़ासिल सजावट के लिए कमरों में रखा जाता है। इसके तने बहुत छोटे और नक्काशीदार होते थे। प्रजननहेतु अंग विविध प्रकार के होते थे। सा. वीलैंडी (C. wielandi), सा. इनजेन्स (C. ingens), सा. डकोटेनसिस (C dacotensis), इत्यादि मुख्य स्पोर बनाने वाले भाग थे। इस कुल की पत्तियों में रध्रं सिंडिटोकीलिक (syndetocheilic) प्रकार के होते थ जिससे वह विवृतबीज के अन्य पौधों से भिन्न हो गया है और आवृतबीज के पौधों से मिलता जुलता है। इस गण के भी सभी सदस्य लाखों वर्ष पूर्व ही लुप्त हो चुके है। ये लगभग २० करोड़ वर्ष पूर्व पाए जाते थे।

साइकडेलीज़
साइकडेलीज़ गण के नौ वंश आजकल भी मिलते हैं, इनके अतिरिक्त अन्य सब लुप्त हो चुके हैं।
आज कल पाए जानेवाले साइकैंड (cycad) में पाँच तो पृथ्वी के पूर्वार्ध में पाए जाते हैं और चार पश्चिमी भाग में। पूर्व के वंशों में साइकस सर्वव्यापी है। यह छोटा मोटा ताड़ जैसा पौधा होता है और बड़ी पत्तियाँ एक झुंड में तने के ऊपर से निकलती हैं। पत्तियाँ प्रजननवाले अंगों को घेरे रहती हैं। अन्य चार वंश किसी एक भाग में ही पाए जाते हैं, जैसे मैक्रोज़ेमिया (Macrozamia) की कुल 14 जातियाँ और बोवीनिया (Bowenia) की एकमात्र जाति आस्ट्रेलिया में ही पाई जाती है। एनसिफैलॉर्टस (Encephalortos) और स्टैनजीरिया (Stangeria) दक्षिणी अफ्रीका में पाया जाता है।
पश्चिम में पाए जानेवाले वंश में जेमिया (Zamia) अधिक विस्तृत है। इसके अतपिक्त माइक्रोसाइकस (Microcycas) सिर्फ पश्चिमी क्यूबा, सिरैटाज़ेमिया (Ceratozamia) और डियून (Dioon) दक्षिण में ही पाए जाते हैं। इन सभी वंशों में से भारत में भी पाया जानेवाला साइकस का वंश प्रमुख है।
साइकस भारत, चीन, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका में स्वत: तथा बाटिकाओं में उगता है। इसकी मुख्य जातियाँ साइकस पेक्टिनेटा (Cycaspectinata), सा. सरसिनेलिस (C. circinalis), सा. रिवोल्यूटा (C. revoluta), इत्यादि हैं। इनमें एक ही तना होता है। पत्ती लगभग एक मीटर लंबी होती है। इस पौधे से एक विशेष प्रकार की जड़, जिसे प्रवालाभ मूल (Coralloid root) कहते हैं, निकलती है। इस जड़ के भीतर एक गोलाई में हरे, नीले शैवाल निवास करते हैं। तने मोटे होते हैं, परंतु कड़े नहीं होते। इन तनों के वल्कुट के अंदर से साबूदाना बनानेवाला पदार्थ निकाला जाता है, जिससे साबूदाना बनाया जाता है। पत्तियों में घुसने वाली नलिका जोड़े में स्तम्भ से निकल कर डंठल में जाती है, जहाँ कई संवहन पूल (vascular bundle) पाए जाते हैं। पत्तियों के आकार और अंदर की बनावट से पता चलता है कि ये जल को संचित रखने में सहायक हैं। रध्रं सिर्फ निचले भाग ही में घुसी हुई दशा में पाया जाता है। प्रजनन दो प्रकार के कोन (cone) या शंकु द्वारा होता है। लघु बीजाणु (microspore) पैदा करनेवाले माइक्रोस्पोरोफिल के मिलने से नर कोन, या नर शंकु (male cone और बड़े बीजांड (ovule) वाले गुरु बीजाणुवर्ण (megasporophyll) के संयुक्त मादा कोन (female cone), या मादा शंकु बनते हैं। समस्त वनस्पति जगत के बीजांड में सबसे बड़ा बीजांड साइकस में ही पाया जाता है। यह लाल रंग का होता है। इसमें अध्यावरण के तीन परत होते हैं, जिनके नीचे बीजांडकाय और मादा युग्मकोद्भिद (female gametophyte) होता है। स्त्रीधानी (archegonium) ऊपर की ओर होती है और परागकण बीजांडद्वार (micraphyle) के रास्ते से होकर, परागकक्ष तक पहुँच जाता है। गर्भाधान के पश्चात् बीज बनता है। परागकण से दो शुक्राणु (sperm) निकलते हैं, जो पक्ष्माभिका (cilia) द्वारा तैरते हैं।
पेंटाग्ज़िलेलीज़ एक ऐसा अनिश्चित वर्ग है जो साइकाडोफाइटा तथा कोनीफेरोफाइटा दोनों से मिलता जुलता है। इस कारण इसे यहाँ उपर्युक्त दोनों वर्गों के मध्य में ही लिखा जा रहा है। यह अब गण के स्तर पर रखा जाता है। इस गण की खोज भारतीय वनस्पतिशास्त्री आचार्य बीरबल साहनी ने की है। इसके अंतर्गत आनेवाले पौधों, या उनके अंगों के फॉसिल बिहार प्रदेश के राजमहल की पहाड़ियों के पत्थरों में दबे मिले हैं। तने को पेंटोज़ाइलान (Pentoxylon) कहते हैं, जो कई सेंटीमीटर मोटा होता था और इसमें पाँच रंभ (stoles) पाए जाते थे। इसके अतिरिक्त राजमहल के ही इलाके में निपानिया ग्राम से प्राप्त तना निपानियोज़ाइलान (Nipanioxylon) भी इसी गण में रखा जाता है। इस पौधे की पत्ती को निपानियोफिलम (Nipaniophyllum) कहते हैं, जो एक चौड़े पट्टे के आकार की होती थी। इसका रंभ आवृतबीज की तरह सिनडिटोकीलिक (syndetocheilic) प्रकार का होता है। बीज की दो जातियाँ पाई गई हैं, जिन्हें कारनोकोनाइटिस कॉम्पैक्टम (Carnoconites compactum) और का. लैक्सम (C. laxum) कहते हैं। बीज के साथ किसी प्रकार के पत्र इत्यादि नहीं लगे होते। नर फूल को सहानिया (Sahania) का नाम दिया गया है।

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