अलैंगिक प्रजनन क्या है और इसकी उपयोगिता

अलैंगिक प्रजनन

अलैंगिक प्रजनन अधिकांश जंतुओं में प्रजनन की क्रिया के लिए संसेचन (शुक्राणु का अंड से मिलना) अनिवार्य है; परंतु कुछ ऐसे भी जंतु हैं जिनमें बिना संसेचन के प्रजनन हो जाता है, इसको आनिषेक जनन या अलैंगिक जनन (Asexual reproduction) कहते हैं।

कुछ मछलियों को छोड़कर किसी भी पृष्ठवंशी में अनिषेक जनन नहीं पाया जाता और न कुछ बड़े बड़े कीटगण, जैसे व्याधपतंगगण (ओडोनेटा) तथा भिन्नपक्षानुगण (हेटरोष्टरा) में। कुछ ऐसे भी जंतु हैं जिनमें प्रजनन सर्वथा (अथवा लगभग सर्वथा) अनिषेक जनन द्वारा ही होता है, जैसे द्विजननिक विद्धपत्रा (डाइजेनेटिक ट्रेमैडोड्स), किरोटवर्ग (रोटिफर्स), जलपिंशु (वाटर फ़्ली) तथा द्रुयूका (ऐफ़िड) में। शल्किपक्षा (लेपिडोप्टरा) में अनिषेक जनन बिरले ही मिलता है, किंतु स्यूनशलभवंश (सिकिड्स) की कई एक जातियों में पाया जाता है। घुनों के कुछ अनुवंशों में भी अनिषेक जनन प्राय: पाया जाता है। अलैंगिक प्रजनन

प्रजनन, लिंगनिश्चयन, तथा कोशिकाविज्ञान (साइटॉलोजी) की दृष्टि से कई प्रकार के अनिषेक जननतंत्र पहचाने जा सकते हैं। अभिषेक जनन के उदाहरण-मधुमक्खी,रोटीफर्स,पक्षी(टर्की) तथा कुछ छिपकली। अलैंगिक प्रजनन

प्रजनन की दृष्टि से अनिषेक जनन

प्रजनन की दृष्टि से अनिषेक जनन का निम्नलिखित वर्गीकरण हो सकता है :

आकस्मिक अनिषेक जनन
इसमें असंसिक्त अंडा कभी-कभी विकसित हो जाता है।

सामान्य अनिषेक जनन
सामान्य अनिषेक जनन निम्नलिखित प्रकारों का होता है:

अनिवार्य अनिषेक जनन
इसमें अंडा सर्वदा बिना संसेचन के विकसित होता है:

क. पूर्ण अनिषेक जनन में सब पीढ़ी के व्यक्तियों में अनिषेक जनन पाया जाता है।

ख. चक्रिक अनिषेक जनन में एक अथवा अधिक अनिषेक जनित पीढ़ियों के बाद एक द्विलिंग पीढ़ी आती रहती है।

वैकल्पिक अनिषेक जनन
इसमें अंडा या तो संसिक्त होकर विकसित होता है या अनिषेक जनन द्वारा।

लिंगनिश्चय की दृष्टि से अनिषेक जनन
लिंगनिश्चय के विचार से अनिषेक जनन तीन प्रकार के होते है:

क. पुंजनन (ऐरिनॉटोकी) में असंसिक्त अंडे अनिषेक जनन द्वारा विकसित होकर नर जंतु बनते हैं। संसिक्त अंडे मादा जंतु बनते हैं। अलैंगिक प्रजनन

ख. स्त्रीजनन (थेलिओटोकी) में असंसिक्त अंडे विकसित होकर मादा जंतु बनते हैं।

ग. उभयजनन (डेंटरोटोकी, ऐंफ़िटोकी) में असंसिक्त अंडे विकसित होकर कुछ नर और कुछ मादा बनते हैं। अलैंगिक प्रजनन

कोशिकाविज्ञान की दृष्टि से अनिषेक जनन
कोशिकातत्व की दृष्टि से अनिषेक जनन कई प्रकार का होता है:

अर्धक अनिषेक जनन
अर्धक अनिषेक जनन में अनिषेक जनन द्वारा उत्पन्न जंतु उन अंडों से विकसित होते हैं जिनमें केंद्रक सूत्रों (क्रोमोसोमों) का ह्रास होता है और केंद्रक सूत्रों की मात्रा आधी हो जाती है। यह दो विधि से होता है:

तनू अनिषेक जनन
तनू अनिषेक जनन में अनिषेक जनन द्वारा उत्पन्न जंतुओं में केंद्रकसूत्रों की संख्या द्विगुण अथवा बहुगुण होती है। यह दो विधियों से होता है:

स्वतस्संसेचक (ऑटोमिक्टिक)

स्वतस्संसेचक (ऑटोमिक्टिक) अनिषेक जनन में नियमित रूप से केंद्रक सूत्रों का युग्मानुबंध (सिनैप्सिस) तथा ह्रास होता है और केंद्रक सूत्रों की संख्या अंडों में आधी हो जाती है। परंतु केंद्रक सूत्रों की मात्रा, दो अर्धकेंद्रकों (न्यूक्लिआई) के सम्मेलन (फ़्यूज्हन) से पुन: स्थापित (रेस्टिट्यूटेड) केंद्रक के निर्माण अथवा अंतर्भाजन (एंडोमाइटोसिस) द्वारा पुन: बढ़ जाती है।

अमैथुनी (ऐपोमिक्टिक)

अमैथुनी (ऐपोमिक्टिक) अनिषेक जनन में न तो केंद्रक सूत्रों की मात्रा में ह्रास होता है और न अर्धक अनिषेक जनन अंडों में केंद्रक सूत्रों का युग्मानुबंध और ह्रास होता है। ऐसे अंडों का यदि संसेचन होता है तो वे विकसित होकर मादा बन जाते हैं और यदि संसेचन नहीं होता तो वे नर बनते हैं। इस कारण एक ही मादा के अंडे विकसित होकर नर भी बन सकते हैं और मादा भी। अर्धक अनिषेक जनन का फल इस कारण सदा ही वैकल्पिक एवं पुंजनन (ऐरिनॉटोकस) होता है।

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