उत्खनन (पुरातत्व) एवं उसके मुख्य प्रकार भाग-01

उत्खनन (पुरातत्व)

शब्द पुरातात्विक उत्खनन के दो अर्थ हैं।

उत्खनन (पुरातत्व) विज्ञान में उत्खनन का सर्वाधिक प्रयोग होता है तथा इसे इसी के साथ सम्बन्ध रखने के लिए जाना जाता है। इस सन्दर्भ में इसे पुरातात्विक अवशेषों को उजागर, प्रक्रम तथा अभिलेखित करने के लिए जाना जाता है।
इस शब्द का प्रयोग किसी स्थान के अध्ययन के लिए प्रयोग की गयी तकनीक के उदाहरण के रूप में भी किया जाता है। इस अर्थ में, उत्खनन को कभी-कभी इसमें भाग लेने वालों के द्वारा अति सरल रूप में “खुदाई ” से भी इंगित किया जाता है। इस तरह का स्थानिक उत्खनन एक विशिष्ट पुरातात्विक स्थल अथवा ऐसे स्थलों की श्रृंखला से सम्बंधित होता है तथा कई वर्षों तक चल सकता है।

संक्षिप्त विवरण

उत्खनन के प्रयोग में बहुत सी विशिष्ट तकनीकें उपलब्ध हैं, तथा इनमें से प्रत्येक खुदाई के अपने गुण हैं, तथा इनसे पुरातत्वविद की शैली का पता चलता है। संसाधनों और अन्य व्यावहारिक मुद्दों के कारण पुरातत्वविद अपनी इच्छानुसार जब चाहें व जहां चाहें उत्खनन नहीं कर पाते.

इन बाधाओं का अर्थ यह है कि कई ज्ञात स्थलों के उत्खनन को जान-बूझकर छोड़ दिया गया है। इसका उद्देश्य इन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने के साथ-साथ इनके द्वारा इसके आस-पास रहने वाले समुदायों के लिए इनकी भूमिका भी है। कुछ मामलों में यह आशा भी व्यक्त की जाती है कि प्रौद्योगिकी सुधार के द्वारा बाद में इन्हें पुनःपरीक्षण किये जाने में सहायता मिलेगी तथा उससे प्राप्त परिणाम अधिक लाभकारी होंगे। किसी पुरातात्विक स्थल पर खुदाई तथा प्राप्त कलाकृतियों की रिकॉर्डिंग को ही उत्खनन कहते हैं।

पुरातात्विक अवशेषों की उपस्थिति या अनुपस्थिति को रिमोट सेंसिंग, उदाहरण के लिए जमीन के भीतर देख सकने वाली रडार, के द्वारा उच्च संभावना के साथ बताया जा सकता है। वास्तव में, पुरातात्विक स्थल के विकास के विषय में ऊपरी जानकारी तो इन तरीकों से प्राप्त हो सकती है परन्तु सूक्ष्म विशेषताओं को जानने के लिए बरमे के उचित उपयोग के साथ किये गए उत्खनन की ही आवश्यकता होती है।

ऐतिहासिक विकास

उत्खनन की तकनीकों का विकास खजाने खोजने के समय से ही होता आ रहा है, जबकि अन्वेषक किसी स्थल पर मानवीय गतिविधियों के द्वारा पड़ने वाले सम्पूर्ण प्रभाव को जानने का प्रयास करते थे, साथ ही इस स्थल का दूसरे स्थलों के साथ-साथ जिस भूदृश्य में यह स्थित है, उसके साथ सम्बन्ध को जानने का भी प्रयास होता था।

इसका इतिहास खजानों तथा कलाकृतियों की एक अपरिपक्व खोज से प्रारंभ होता है जो “दुर्लभ कलाकृति” की श्रेणी में आते थे। पुरातात्विक महत्त्व की वस्तुओं को एकत्रित करने वाले इन दुर्लभ कलाकृतियों में बहुत रूचि लेते थे। बाद में इसकी सराहना की गयी कि थी कि किसी स्थल पर पूर्व समय के लोगों के जीवन के साक्ष्य थे जो कि खुदाई के द्वारा नष्ट हो गए। किसी दुर्लभ कलाकृति को अपने स्थान से हटा देने पर इसमें निहित अधिकांश सूचनाएं नष्ट हो जाती हैं। इसी अनुभूति के परिणामस्वरुप पुरातात्विक महत्त्व की वस्तुओं को एकत्रित करने का स्थान पुरातत्व विज्ञान ने ले लिया, यह वह प्रक्रिया है जिसे अभी भी परिपूर्ण बनाया जा रहा है।

स्थानिक रचना

जब इसे स्थान पर ही छोड़ दिया गया हो, पुरातात्विक सामग्री, कोई विशेष अर्थ नहीं प्रदर्शित करती है। इसे घटनाओं के साथ ही संचित किया जाता है। किसी माली ने एक कोने में मिट्टी का एक ढेर बना कर एक बजरी-पथ बनाया हो सकता है, या किसी छेद में एक पौधा लगाया हो सकता है।

किसी राजगीर ने एक दीवार बनायी तथा खाई को भर दिया। कई वर्षों बाद, किसी ने इसपर एक शूकरशाला बनायी तथा इसमें नेटल पौधों का झुरमुट लगा दिया। बाद में, मूल दीवार ढह गयी। इनमें से प्रत्येक घटना, जिसे पूर्ण होने में लम्बा अथवा छोटा समय लग सकता है, एक परिस्थिति का निर्माण करती है। ये घटनाएं जो परतों के रूप में एकत्रित हो जाती हैं, पुरातात्विक अनुक्रम अथवा रिकॉर्ड कहलाती हैं। इस अनुक्रम अथवा रिकार्ड के अध्ययन से उत्खनन के द्वारा विवेचना की जाती है, जिसके बाद इन पर परिचर्चा तथा ज्ञान विकसित किया जाता है।

प्रमुख प्रोकेज़ुअल पुरातत्वविद् लुईस बिन्फोर्ड ने उल्लेख किया है कि किसी स्थल पर प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्य उस स्थल पर हुए ऐतिहासिक घटनाओं की ओर पूरी तरह से इंगित नहीं करते. एक एथनोआर्कियोलॉजिकल तुलना करते हुए, वे बताते हैं कि उत्तर-मध्य अलास्का के न्यूनाम्यूट एस्किमो शिकारी अपने शिकार की प्रतीक्षा करते हुए कैसे समय व्यतीत करते थे, तथा उस समय के दौरान वे समय व्यतीत करने के लिए किस प्रकार के कार्य करते थे, जिनमें विविध वस्तुओं पर नक्काशी, जैसे कि काष्ठ के सांचे, मुखौटे, सींग की चम्मचें, हाथीदांत की सुई के साथ साथ चमड़े के थैलों तथा हरिण की खाल से बने मोजों की मरम्मत आदि सम्मिलित थे।

बिन्फोर्ड कहते हैं कि इन सभी गतिविधियों के पुरातात्विक साक्ष्य उत्पन्न हुए होंगे, परन्तु इनमें से किसी से भी इन शिकारियों के इस क्षेत्र में एकत्रित होने के मुख्य कारण का पता नहीं चलता; जो कि वास्तव में शिकार करना था। वे बताते हैं कि जानवरों के शिकार के लिए प्रतीक्षा करना “उनकी गतिविधि के कुल समय का 24% व्यतीत होता था; हालांकि इस व्यवहार का कोई पुतात्विक निष्कर्ष नहीं है। स्थल पर मौजूद कोई भी उपकरण तथा “उपोत्पाद” “मुख्य” गतिविधि की ओर संकेत नहीं करते हैं। स्थल पर की जाने वाली सभी गतिविधियां आवश्यक रूप से ऊब मिटने के लिए की गयीं थीं।”

उत्खनन के प्रकार

लंदन में एक विकासात्मक वित्त पोषित साइट पर रोमन खाई में दफ़न किया गया एक घोड़ा.नोट “चरण से बाहर” पाइप हस्तक्षेप को व्यावहारिक कारणों से छोड़ दिया गया

बुनियादी प्रकार

आधुनिक पुरातात्विक उत्खनन के दो बुनियादी प्रकार हैं:

अनुसंधान उत्खनन – जब साइट को इत्मीनान से पूरी तरह से उत्खनन करने के लिए समय और संसाधन उपलब्ध होते हैं। यह अब लगभग अनन्य रूप से शिक्षाविदों या निजी समितियों के लिए, जो पर्याप्त श्रम तथा धन एकत्रित कर सकते हैं, सुरक्षित रह गया है। जैसे-जैसे यह आगे बढ़ती है, निदेशक द्वारा खुदाई के आकार का निर्णय भी लिया जा सकता है।

विकासात्मक उत्खनन

यह पेशेवर पुरातत्वविदों द्वारा की जाती है जब इमारतों के बढ़ने से पुरातात्विक स्थल खतरे में आ जाता है। यह सामान्य रूप से इमारत के डेवलपर (बनाने वाला) द्वारा वित्त पोषित होता है, एवं इसका अर्थ यह है कि इसमें समय महत्वपूर्ण होता है तथा इसमें उन्ही क्षेत्रों पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है जो इमारत से प्रभावित हो रहे होते हैं।

आमतौर पर कार्यरत कर्मचारी अधिक कुशल होते हैं हालांकि विकासात्मक-पूर्व उत्खनन खोज किये गए क्षेत्रों का विस्तृत रिकॉर्ड भी उपलब्ध कराते हैं। बचाव सम्बन्धी पुरातत्व-विज्ञान (Rescue archaeology) को हालांकि एक अलग प्रकार का उत्खनन माना जाता है परन्तु व्यवहारिक रूप से यह विकासात्मक उत्खनन का ही एक प्रकार है। हाल के कुछ वर्षों में उत्खनन शब्दावली में नए प्रकार के उत्खननों का विकास हुआ है, जैसे कि स्ट्रिप मैप व सेम्पल, इस पेशे में इनमें से कुछ को शब्दजाल कहते हुए आलोचना की गयी है कि इनका प्रयोग कार्य प्रणाली के गिरते हुए स्तर को छिपाने के लिए किया जाता है।

परीक्षण उत्खनन तथा विकासात्मक उत्खनन का मूल्यांकन

पेशेवर पुरातत्वविज्ञान में दो प्रकार के परीक्षण उत्खनन होते हैं तथा दोनों ही विकासात्मक उत्खनन से सम्बंधित होते हैं: इनका नाम टेस्ट पिट अथवा ट्रेंच तथा वाचिंग ब्रीफ है। परीक्षण उत्खनन का प्रयोजन किसी क्षेत्र में विस्तृत उत्खनन से पहले पुरातात्विक संभाव्यता के विस्तार तथा विशेषताओं को सुनिश्चित करना होता है।

अधिकांशतः इन्हें विकासात्मक उत्खनन में प्रोजेक्ट मैनेजमेंट योजना के अंतर्गत किया जाता है। ट्रायल ट्रेंच तथा वाचिंग ब्रीफ में मुख्य अंतर यह है कि ट्रायल ट्रेंच में सक्रिय रूप से खुदाई करके पुरातात्विक संभाव्यता को दर्शाने का प्रयास किया जाता है जबकि वाचिंग ब्रीफ सरसरी तौर पर खंदकों का अध्ययन है जहां पर खंदकें पुरातात्विक प्रयोग हेतु नहीं देखी जाती हैं, उदाहरण के रूप में गैस पाइप के लिए सड़क पर काटी गयी खंदक. संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रयुक्त एक मूल्यांकन पद्धति जिसे शौवेल टेस्ट पिट कहते हैं, जिसमें आधे वर्ग मीटर की ट्रायल ट्रेंच हाथ से खोदी जाती है।

अक्सर पुरातत्वविज्ञान अतीत के लोगों के अस्तित्व और व्यवहार को जानने का एकमात्र साधन होता है। हजारों वर्षों में अनेक सहस्त्र सभ्यताएं व समाज तथा उनमें रहने वाले अरबों लोग आये और गए जिनके विषय में लिखित रिकॉर्ड अल्प अथवा उपलब्ध नहीं है, अथवा उपलब्ध रिकॉर्ड गलत अथवा अपूर्ण है।

जिस प्रकार आजकल इसका लेखन किया जाता है, वह 4 सहस्राब्दी ई.पू. तक अस्तित्व में नहीं था, मानव सभ्यता में तकनीकी रूप से उन्नत सभ्यताओं की एक अपेक्षाकृत छोटी संख्या ने इसके बाद ही यह लेखन प्रारंभ किया। इसके विपरीत होमो सेपियंस कम से कम 200,000 साल से अस्तित्व में है, तथा होमो की अन्य प्रजातियां लाखों वर्षों से विद्यमान हैं (मानव विकास देखें).

इन सभ्यताओं को सर्वश्रेष्ठ रूप से संयोगवश ही नहीं जाना जाता है; सदियों से वे इतिहासकारों की जानकारी के लिए उपलब्ध हैं, जबकि पूर्वैतिहासिक सभ्यताओं का अध्ययन हाल में ही प्रारंभ हुआ है। कई साक्षर सभ्यताओं में भी कई घटनाओं और महत्वपूर्ण मानव व्यवहार को आधिकारिक तौर पर दर्ज नहीं किया गया है। मानव सभ्यता के प्रारंभिक वर्षों से कोई ज्ञान – कृषि विकास, लोक धर्म की पंथ प्रथायें, प्रारंभिक नगरों का विकास – पुरातत्व से प्राप्त होना चाहिए।

धौलाविरा के उत्तरी फाटक के पास से दस सिंधु शब्द-चिन्ह प्राप्त हुए हैं (लगभग 2500-1900 वर्ष प्राचीन), जहां पर लिखित रिकॉर्ड मौजूद हैं भी, वे अक्सर अधूरे तथा अवश्य ही कुछ सीमा तक पक्षपातपूर्ण हैं। कई समाजों में, साक्षरता कुलीन वर्ग तक ही सीमित थी, उदाहरण के रूप में पुरोहित वर्ग अथवा अदालत या मंदिर में कार्यरत लोगों तक. अभिजात्य वर्ग की साक्षरता भी अक्सर अनुबंध तथा दस्तावेजों तक ही सीमित थी। अभिजात्य वर्ग के अपने हित तथा दुनिया को देखने का नज़रिया अक्सर आम आदमियों से काफी भिन्न होता था।

सामान्य लोगों के प्रतिनिधियों द्वारा किये गए लेखन के पुस्तकालयों में रखे जाने तथा आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित किये जाने की संभावनाएं बहुत ही कम थीं। इस प्रकार, लिखित रिकॉर्ड सीमित व्यक्तियों के पक्षपात, कल्पना, सांस्कृतिक मूल्य तथा संभावित कपट का प्रदर्शन करते हैं, जो कि बड़ी जनसंख्याओं का एक छोटा अंश मात्र ही थे। इसलिए, लिखित रिकॉर्ड पर एकमात्र स्रोत के रूप में भरोसा नहीं किया जा सकता है। सामग्री के रूप में प्राप्त रिकॉर्ड समाज के उचित प्रतिनिधित्व करने के निकट है, हालांकि यह अपनी अशुद्धियों पर निर्भर है जैसे कि नमूना लेने में किया गया पक्षपात तथा विभेदात्मक परिरक्षण.

इनके वैज्ञानिक महत्व के अतिरिक्त, पुरातात्विक अवशेष कभी-कभी उन्हें बनाने वालों के वंशजों के राजनैतिक या सांस्कृतिक महत्व, एकत्रित करने वालों को प्राप्त होने वाले मौद्रिक मूल्य अथवा सशक्त कलापक्ष से प्रभावित होते हैं। बहुत से लोग पुरातत्व को इस तरह के सौंदर्य, धार्मिक, राजनीतिक, अथवा आर्थिक कोष की प्राप्ति से जोड़ कर देखते हैं न कि पूर्वकाल के समाजों के पुनर्निर्माण के रूप में.

यह दृष्टिकोण अक्सर लोकप्रिय फिक्शन से प्राप्त होता है, जैसे रेडर्स ऑफ दि लॉस्ट आर्क, दि ममी एवं किंग सोलोमंस माइन्स. जब इस तरह के अवास्तविक विषयों को गंभीरता से देखा जाता है, उनके समर्थकों पर सदैव छद्मविज्ञान का आरोप लगाया जाता है (नीचे सूडोआर्कियोलॉजी देखें). हालांकि, ये प्रयास, चाहे वे वास्तविक अथवा काल्पनिक हों, आधुनिक पुरातत्व का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।

खुदाई की अवधारणायें

स्तरीकरण

पुरातत्व, विशेष रूप से उत्खनन में स्तरीकरण सर्वोच्च और आधारभूत अवधारणा है। यह सुपरपोज़ीशन के नियम पर आधारित है। जब पुरातात्विक अवशेष जमीन की सतह से नीचे होते हैं (जैसा कि आमतौर पर होता है), प्रत्येक के संदर्भ की पहचान करना, पुरातत्वविद् के लिए उस पुरातात्विक स्थल के विषय में निर्णय लेने के लिए आवश्यक होता है, साथ ही इससे उस स्थल की प्रकृति तथा तारीख के विषय में भी जाम्कारी मिलती है।

कौन से संदर्भ मौजूद हैं और वे कैसे बनाये गए, यह जान्ने का प्रयास करना पुरातत्वविद् की भूमिका होती है। पुरातात्विक स्तरीकरण या अनुक्रम स्टार्टिग्राफी अथवा सन्दर्भ की इकाई का सक्रिय सुपरपोज़ीशन है। पुरातत्व में, पुरातात्विक स्थल (भौतिक स्थान) की खोज महत्वपूर्ण होती है। अधिक स्पष्ट रूप से कोई पुरातात्विक संदर्भ समय-काल में एक घटना है जो पुरातात्विक रिकार्ड में संरक्षित हो गयी हो।

भूतकाल में गड्ढे अथवा खाई को काटना एक संदर्भ है, जबकि सामग्री भरना दूसरा संदर्भ है। अनुभाग में कई भरण का दिखना कई संदर्भ कहे जायेंगे. संरचनात्मक विशेषताएं, प्राकृतिक निक्षेप तथा शवों को गाड़ना भी सन्दर्भ होंगे। किसी स्थल को इन बुनियादी, असतत इकाइयों में वर्गीकृत करने से पुरातत्वविद गतिविधियों के कालक्रम को बना सकते हैं तथा इनका वर्णन और व्याख्या की जा सकती है।

स्तरीकरण संबंध ऐसे संबंध होते हैं जिन्हें समय आधारित पुरातात्विक स्थलों के बीच स्थापित किया जाता है, ऐसा उनके बनने के कालानुक्रमिक अनुक्रम में किया जाता है। एक उदाहरण किसी खाई तथा उस खाई को वापस भरने का हो सकता है। खाई को “भरे जाने” तथा “काटे जाने” के सन्दर्भ में “भरा जाना” क्रम में बाद में आएगा, उदाहरण के लिए खाई को भरे जाने से पूर्व उसको काटा जाना आवश्यक है।

एक संबंध यह है कि अनुक्रम में बाद में आने वाले को “उच्च ” संदर्भित किया जाता है तथा अनुक्रम में पहले आने वाले को “निम्न ” संदर्भित किया जाता है, हालांकि शब्द उच्च अथवा निम्न का अर्थ यह नहीं है सन्दर्भ भौतिक रूप से ऊंचा अथवा नीचा हो। यह उच्च व निम्न की सोच हैरिस मैट्रिक्स के रूप में अधिक उपयोगी हो सकती है, जो कि किसी स्थल के स्थान व समय में निर्माण का दो-आयामी निरूपण है।

व्याख्या के लिए स्तरीकृत संदर्भों का मेल

आधुनिक पुरातत्व में किसी पुरातात्विक स्थल को समझने के लिए सन्दर्भों को समूहों में बांट कर उनके संबंधों के आधार पर उस समूह को बड़ा करते जाने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इन बड़े समूहों के नाम की शब्दावली अलग-अलग व्यावसाइयों के आधार पर बदलती है परन्तु कुछ शब्द जैसे कि अंतरापृष्ठ, उप-समूह, समूह तथा भूमि प्रयोग आदि सामान्य रूप से प्रयोग किये जाते हैं।

उप-समूह का एक उदाहरण दफ़न में प्रयुक्त तीन सन्दर्भों से समझा जा सकता है; कब्र का आकार, मृत शरीर तथा उस शरीर के ऊपर पुनः भरी गयी मिट्टी. इस प्रकार उप-समूह अन्य उप-समूहों के साथ स्तरीकृत संबंधों के आधार पर एकत्रित होकर समूहों की रचना करते हैं जो कि इसी प्रकार “चरण” बनाती है।

एक उप-समूह दफन-क्रिया अन्य उप-समूह दफन-क्रिया के साथ बड़ा समूह बना कर एक कब्रिस्तान का रूप ले सकती है, अथवा दफन-क्रिया समूह भी बना सकती है जिसे बाद में किसी भवन, जैसे कि गिरिजाघर के रूप में “चरण” की तरह समझा जा सकता है। एक या अधिक सन्दर्भों का एक कम सख्ती से किया गया समूह कभी-कभी फीचर भी कहलाता है।

चरण और चरणबद्धता

उसी रोमानो-केल्टिक मंदिर में चरण में भीतरी दीवार के निर्माण के तुरंत बाद और बाहरी दीवार के चित्र के बाईं ओर तक के निर्माण से पहले को निर्माण के स्तर तक कम कर दिया गया। नोट चरण को कम करने से मंदिर के विस्तृत निर्माण के सही अनुक्रम के विषय में जानकारी का प्राप्त की गयी.

चरण आम आदमी को सबसे आसानी से समझ में आनेवाला समूहीकरण है, क्योंकि इसका अभिप्राय लगभग समकालीन पुरातात्विक क्षितिज से है जो दर्शाता है “यदि आप किसी विशिष्ट समय में वापस जा पाते, तो आपको क्या दिखाई पड़ता”.

एक चरण का आशय, अक्सर, लेकिन हमेशा नहीं, एक व्यावसायिक स्तर की पहचान से सम्बंधित होता है, एक “प्राचीन धरातल”, जो कुछ समय पहले मौजूद था। चरण की व्याख्या का निर्माण स्तरीकृत व्याख्या और उत्खनन का पहला लक्ष्य होता है।

“चरण में” खुदाई चरणबद्धता से भिन्न है। पुरातात्विक स्थल की चरणबद्धता का अर्थ स्थल को उत्खनन अथवा उत्खनन-पश्चात समकालीन क्षितिजों में बांटने से होता है जबकि “चरण में खुदाई” पुरार्तात्विक अवशेषों को स्तरीकृत रूप से ऐसे हटाना होता है जिससे कि वे सन्दर्भ न हटने पायें जो कि सामयिक रूप से इसके पूर्व के हों अथवा “अनुक्रम में नीचे की ओर हों”

इससे पहले कि अन्य सन्दर्भ जो कि स्तरीकरण सम्बन्ध में इसके बाद आते हैं जैसा कि सुपरइम्पोज़ीशन के नियम में कहा गया है। व्यवहार में व्याख्या की प्रक्रिया पुरातात्विक स्थल पर उत्खनन की रणनीति के साथ ही जारी रहेगी ताकि जहां तक संभव हो “चरणबद्धता” को उत्खनन के दौरान ही किया जा सके, तथा इसे एक अच्छी कार्यप्रणाली माना जाता है।

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