पादप वर्गीकरण भाग – 2

पौधों की विस्तृत वर्गीकृत स्थिति का ज्ञान जिन इकाइयों द्वारा होता है, उन्हें वर्गीकरण की इकाई कहते है जैसे –

  1. जगत (Kingdom)
  2. प्रभाग (Division)
  3. उप प्रभाग (Sub-division)
  4. संवर्ग (Class)
  5. उपसंवर्ग (Sub-Class)
  6. गण (Order)
  7. उप गण (Sub-order)
  8. कुल (Family)
  9. उपकुल (Sub-Family)
  10. ट्राइब (Tribe)
  11. सब-ट्राइब (Sub-tribe)
  12. वंश (Genus)
  13. उप-वंश (Sub-genus)
  14. जाति (species) – (sps.)
  15. उप-जाति (Sub-species) – (ssp.)
  16. किस्म (Variety) – (var.)
  17. उप किस्म (subvariety) – (subvar.)
  18. फोर्मा (Forma) – (f.)
  19. स्लोन (Clone) – (cl.)
    विभिन्न वर्गिकीय वर्ग (Taxonomic categories) के कुछ प्रमाणिक अनुलग्न (Suffix) नीचे दिये गये है :
    वर्ग (Class) — अनुलग्न (Suffix)
    संवर्ग (Class) — eae
    गण (Order) — ales
    उप-गण (Sub-Order) — ineae
    कुल (Family) — aceae
    उप-कुल (Sub-family) — oideae
    ट्राइब (Tribe) — eae
    सब-ट्राइब (Sub-Tribe) — inae
    वैसे इन प्रमाणिक अनुलग्नों के अपवाद भी है जिन्हें मान्यता प्राप्त है चूंकि ऐसे नाम काफी लंबी अवधि तक प्रयुस्त किये जाते रहे तथा नामकरण नियमों से पहले काफी लोकप्रिय थे। उदाहरण के लिये सभी गणों (orders) का अनुलग्न-ales है परन्तु कुछ गण जैसे (glumiflorae व tubiflorae में यह- ae है ; इसी प्रकार सभी कुलों का अनुलग्न- aceae है परन्तु कुछ कुल जैसे Palmae, Cruciferae, Leguminosae, Umbelliferae, Labiatae आदि में यह नहीं है, फिर भी नियमावली में इन नामों में छूट की व्यवस्था है। सभी वर्ग (Taxon) के नाम (कुल (Family) व इसकी नीचे की श्रेणी) को लेटिन भाषा में लिखना अनिवार्य है।
    सामान्यत: सभी वर्गकों की आधारभू त इकाई वंश (Genus) होती है तथा इसके अन्तर्गत आने वाली सभी कोटियों (Rank) को लिखते समय निम्न दो मुख्य सिद्धान्तों का पालन करना अनिवार्य है-
  20. वंश, जाति तथा कोटियाँ हमेशा लेटिन भाषा में लिखी हों।
  21. लेटिन भाषा में लिखे शब्दों को इटेलिक अक्षरों (Italic fonts) में दर्शाना आवश्यक है।
    हाथ से लिखने पर या टाइप करते समय अधोरे खांकित (underline) किया जाना चाहिए।
    पादप जगत (Plantae) में शैवाल (एल्गी), ब्रायोफाइट, टेरिडोफाइट, अनावृतबीजी तथा आवृतबीजी आते हैं।

शैवाल या एलजी

शैवाल के अंतर्गत लगभग 30,000 जातियाँ (species) हैं और इन्हें आठ मुख्य उपवर्गों में बाँटते हैं। उपवर्ग के स्थान में अब वैज्ञानिक इन्हें और ऊँचा स्थान देते हैं। शैवाल के उपवर्ग हैं : सायनोफाइटा (Cyanophyta), क्लोरोफाइटा (Chlorophyta), यूग्लीनोफाइटा (Euglenophyta), कैरोफाइटा (Charophyta), फियोफाइटा (Phaeophyta), रोडोफाइटा (Rhodophyta), क्राइसोफाइटा (Chrysophyta) और पाइरोफाइटा (Pyrrophyta)।
उत्पत्ति के विचार से शैवाल बहुत ही निम्न कोटि के पादप हैं, जिनमें जड़, तना तथा पत्ती का निर्माण नहीं होता। इनमें क्लोरोफिल के रहने के कारण ये अपना आहार स्वयं बनाते हैं। शैवाल पृथ्वी के हर भूभाग में पाए जाते हैं। नदी, तालाब, झील तथा समुद्र के मुख्य पादप भी शैवाल के अंतर्गत ही आते हैं। इनके रंग भी कई प्रकार के हरे, नीले हरे, लाल, कत्थई, नारंगी इत्यादि होते हैं। इनक रूपरेखा सरल पर कई प्रकार की होती है, कुछ एककोशिका सदृश, सूक्ष्म अथवा बहुकोशिका का निवह (colony) या तंतुमय (filamentous) फोते से लेकर बहुत बड़े समुद्री पाम (sea palm) के आकार के होते हैं। शैवाल में जनन की गति बहुत तेज होती है और वर्षा ऋतु में थोड़े ही समय में सब तालाब इनकी अधिक संख्या से हरे रंग के हो जाते हैं। कुछ शैवाल जलीय जंतुओं के ऊपर या घोंघों के कवचों पर उग आते हैं।
शैवाल में जनन कई रीतियों से होता है। अलैंगिक रीतियों में मुख्यत: या तो कोशिकाओं के टूटने से दो या तीन या अधिक नए पौधे बनते हैं, या कोशिका के जीवद्रव्य इकट्ठा होकर विभाजित होते हैं और चलबीजाणु (zoospores) बनाते हैं। यह कोशिका के बाहर निकलकर जल में तैरते हैं और समय पाकर नए पौधों को जन्म देते हैं। लैंगिक जनन भी अनेक प्रकार से होता है, जिसमें नर और मादा युग्मक (gametes) बनते हैं। इसके आपस में मिल जाने से युग्मनज (zygote) बनता है, जो समय पाकर कोशिकाविभाजन द्वारा नए पौधे उत्पन्न करता है। युग्मक अगर एक ही आकार और नाप के होते हैं, तो इसे समयुग्मन (Isogamy) कहते हैं। अगर आकार एक जैसा पर नाप अलग हो तो असमयुग्मन (Anisogamy) कहते हैं। अगर युग्मक बनने के अंग अलग अलग प्रकार के हों और युग्मक भी भिन्न हों, तो इन्हें विषम युग्मकता (Oogamy) कहते हैं। शैवाल के कुछ प्रमुख उपवर्ग इस प्रकार हैं :
सायनोफाइटा (Cyonophyta) – ये नीले हरे अत्यंत निम्न कोटि के शैवाल होते हैं। इनकी लगभग 1,500 जातियाँ हैं, जो बहुत दूर दूर तक फैली हुई हैं। इनमें जनन हेतु एक प्रकार के बीजाणु (spore) बनते हैं। आजकल सायनोफाइटा या मिक्सोफाइटा में दो मुख्य गण (order) हैं : (1) कोकोगोनिऐलीज़ (Coccogoniales) और हॉर्मोगोनिएलीज़ (Hormogoniales)। प्रमुख पौधों के नाम इस प्रकार हैं, क्रूकॉकस (Chroococcus), ग्लीओकैप्सा (Gleoocapsa), ऑसीलैटोरिया (Oscillatoria), लिंगबिया (Lyngbya), साइटोनिमा (Scytonema), नॉस्टोक (Nostoc), ऐनाबीना (Anabaena) इत्यादि।
क्लोरोफाइटा (Chlorophyta) या हरे शैवाल – इसकी लगभग 7,000 जातियाँ हर प्रकार के माध्यम में उगती हैं। ये तंतुवत संघजीवी (colonial), हेट्रॉट्रिकस (heterotrichous) या फिर एककोशिक रचनावाले (uniceleular) हो सकते हैं। जनन की सभी मुख्य रीतियाँ लैंगिक जनन, समयुग्मन इत्यादि तथा युग्माणु (zygospore), चलबीजाणु (Zoospore) पाए जाते हैं।
यूग्लीनोफाइटा (Euglenophyta) – इसमें छोटे तैरनेवाले यूग्लीना (Euglena) इत्यादि को रखा जाता है, जो अपने शरीर के अग्र भाग में स्थित दो पतले कशाभिकाओं (flagella) की सहायता से जल में इधर उधर तैरते रहते हैं। इन्हें कुछ वैज्ञानिक जंतु मानते हैं पर ये वास्तव में पादप हैं, क्योंकि इनके शरीर में पर्णहरित होता है।
कैरोफाइटा (Charophyta) – इसके अंतर्गत केरा (Chara) और नाइटेला (Nitella) जैसे पौधे हैं, जो काफी बड़े और शाखाओं से भरपूर होते हैं। इनमें जनन विषमयुग्मक (Oogomous) होता है और लैंगिक अंग प्यालिका (cupule) और न्यूकुला (nucula) होते हैं।
फिओफाइटा (Phaeophyta) या कत्थई शैवाल – इसका रंग कत्थई होता है और लगभग सभी नमूने समुद्र में पाए जाते हैं। मुख्य उदाहरण हैं : कटलेरिया (Cutleria), फ्यूकस (Fucus), लैमिनेरिया (Laminaria) इत्यादि।
रोडोफाइटा (Rhodophyta) या लाल शैवाल – यह शैवाल लाल रंग का होता है। इसके अंतर्गत लगभग 400 वंश (genus) और 2,500 जातियाँ हैं, जो अधिकांश समुद्र में उगती हैं। इन्हें सात गणों में बाँटा जाता है। लाल शैवाल द्वारा एक वस्तु एगार एगार (agar agar) बनती है, जिसका उपयोग मिठाई और पुडिंग बनाने तथा अनुसंधान कार्यों में अधिकतम होता है। इससे कई प्रकार की औषधियाँ भी बनती हैं। कुछ वैज्ञानिकों का मत है कि शैवाल द्वारा ही लाखों वर्ष पहले भूगर्भ में पेट्रोल का निर्माण हुआ होगा।

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