राजनयिक इतिहास भाग – 1

राजनयिक इतिहास (Diplomatic history) से आशय राज्यों के बीच अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों के इतिहास से है। किन्तु राजनयिक इतिहास अन्तराष्ट्रीय सम्बन्ध से इस अर्थ में भिन्न है कि अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध के अन्तर्गत दो या दो से अधिक राज्यों के परस्पर सम्बन्धों का अध्ययन होता है जबकि राजनयिक इतिहास किसी एक राज्य की विदेश नीति से सम्बन्धित हो सकता है। राजनयिक इतिहास का झुकाव अधिकांशतः राजनय के इतिहास (history of diplomacy) की ओर होता है जबकि अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध समसामयिक घटनाओं पर अधिक ध्यान देता है।
राजनय एक कला है जिसे अपना कर दुनिया के राज्य अपने पारस्परिक सम्बन्धों को बढ़ाते हुए अपनी हित साधना करते हैं। राजनय के सुपरिभाषित लक्ष्य तथा उनकी सिद्धि के लिए स्थापित कुशल यंत्र के बाद इसके वांछनीय परिणामों की उपलब्धि उन साधनों एवं तरीकों पर निर्भर करती है जिन्हें एक राज्य द्वारा अपनाने का निर्णय लिया जाता है। दूसरे राज्य इन साधनों के आधार पर ही राजनय के वास्तविक लक्ष्यों का अनुमान लगाते हैं। यदि राजनय के साधन तथा लक्ष्यों के बीच असंगति रहती है तो इससे देश कमजोर होता है, बदनाम होता है तथा उसकी अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा गिर जाती है। इस दृष्टि्र से प्रत्येक राज्य को ऐसे साधन अपनाने चाहिये जो दूसरे राज्यों में उसके प्रति सद्भावना और विश्वास पैदा कर सकें। इसके लिए यह आवश्यक है कि राज्य अपनी नीतियों को स्पष्ट रूप से समझाये, दूसरे राज्यों के न्यायोचित दावों को मान्यता दे तथा ईमानदारीपूर्ण व्यवहार करे। बेईमानी तथा चालबाजी से काम करने वाले राजनयज्ञ अल्पकालीन लक्ष्यों में सफलता पा लेते हैं किन्तु कुल मिलाकर वे नुकसान में ही रहते हैं। दूसरे राज्यों में उनके प्रति अविश्वास पैदा होता है तथा वे सजग हो जाते हैं। अतः राजनय के तरीकों का महत्व है।
राजनय के साधनों का निर्णय लेते समय यह ध्यान रखना चाहिये कि इसका मुख्य उद्देश्य राज्य के प्रमुख हितों की रक्षा करना है। ठीक यही उद्देश्य अन्य राज्यों के राजनय का भी है। अतः प्रत्येक राजनय को पारस्परिक आदान-प्रदान की नीति अपनानी चाहिये। प्रत्येक राज्य के राजनयज्ञों की कम से कम त्याग द्वारा अधिक से अधिक प्राप्त करने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके लिये विरोधी हितों के बीच समझौता करना जरूरी है। समझौते तथा सौदेबाजी का यह नियम है कि कुछ भी प्राप्त करने के लिए कुछ न कुछ देना पड़ता है। यह आदान-प्रदान राजनय का एक व्यावहारिक सत्य है। इतिहास में ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जबकि एक शक्तिशाली बड़े राज्य ने दूसरे कमजोर राज्य को अपनी मनमानी शर्तें मानने के लिए बाध्य किया तथा समझौतापूर्ण आदान-प्रदान की प्रक्रिया न अपना कर एक पक्षीय बाध्यता का मार्ग अपनाया। इस प्रकार लादी गई शर्तों का पालन सम्बन्धित राज्य केवल तभी तक करता है जब तक कि वह ऐसा करने के लिए मजबूर हो और अवसर पाते ही वह उनके भार से मुक्त हो जाता है। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद मित्र राष्ट्रोंं ने जर्मनी को सैनिक, आर्थिक, व्यापारिक एवं प्रादेशिक दृष्टि्र से बुरी तरह दबाया। क्षतिपूर्ति की राशि अदा करने के लिए उनसे खाली चैक पर हस्ताक्षर करा लिये गये तब जर्मनी एक पराजित और दबा हुआ राज्य था। अतः उसने यह शोषण मजबूरी में स्वीकार कर लिया किन्तु कुछ समय बाद हिटलर के नेतृत्व में जब वह समर्थ बना तो उसने इन सभी शर्तों को अमान्य घोषित कर दिया। स्पष्ट है कि पारस्परिक आदान-प्रदान ही स्थायी राजनय का आधार बन सकता है। बाध्यता, बेईमानी, धूर्तता, छल-कपट एवं केवल ताकत पर आधारित सम्बन्ध अल्पकालीन होते हैं तथा दूसरे पक्ष पर विरोधी प्रभाव डालते हैं।फलतः उनके भावी सम्बन्धों में कटुता आ जाती है।
राजनय के साधन और तरीकों का विकास राज्यों के आपसी सम्बन्धों के लम्बे इतिहास से जुड़ा हुआ है। इन पर देश-काल की परिस्थितियों ने भी प्रभाव डाला है। तदनुसार राजनीतिक व्यवहार भी बदलता रहा है। विश्व के विभिन्न देशों के इतिहास का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि राजनयिक आचार का तरीका प्रत्येक देश का अपना विशिष्ट रहा है। यहाँ हम यूनान, रोम, इटली, फ्रांस तथा भारत में अपनाए राजनयिक आचार के तरीकों का अध्ययन करेंगे।

यूनानी राजनयिक व्यवहार (The Greek Diplomatic Practice)

राजनय का इतिहास यूनानी नगर राज्यों से प्रारम्भ होता है। प्लेटो तथा अरस्तु जैसे राजनीतिक दार्शनिकों ने नगर राज्यों की राजनीतिक स्थिति एवं अन्य राज्यों से उनके सम्बन्धों के बारे में पर्याप्त लिखा है। यूनानी सभ्यता के प्रारम्भिक चरण में नगर राज्यों के राजदूतों को अग्रदूत (Heralds) कहा जाता था। इनका कार्य केवल सन्धि वार्ता करने तक ही सीमित नहीं था वरन् ये राजकीय गृहस्थी के संचालन, सभाओं एवं परिषदों में व्यवस्था की स्थापना तथा धार्मिक अनुष्ठानों के सम्पादन आदि का कार्य भी करते थे। यूनानी सभ्यता के विकास के साथ-साथ नगर राज्यों के सम्बन्ध जटिल एवं स्पर्द्धापूर्ण बन गये। अब सन्धि वार्ता के लिये ऐसे लोगों की आवश्यकता पड़ी जो ओजस्वी तथा प्रभावशाली वक्ता हों, जिनकी तीव्र स्मरण शक्ति एवं बुलन्द आवाज हो ताकि वे दूसरे नगर राज्यों की लोक सभाओं के सम्मुख अपने नगर का दृष्टि्रकोण प्रस्तुत कर सके और उसके पक्ष में जोरदार पुष्टि्र कर सके। राजनयिक पदों पर ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जाने लगा जो पुरात्ववेत्ता एक कुशल वक्ता, राजनीतिक सम्बन्धों का विद्यार्थी तथा मनोवैज्ञानिक हो। प्रसिद्ध इतिहासकार थ्यूसीडाइड्स (Thucidides) के विवरणों को पढ़ने से ज्ञात होता है कि उस समय के राजनयज्ञों की वक्तृतायें पर्याप्त ओजस्वी तथा सुदीर्घ हुआ करती थी। इसने स्पार्टा निवासियों की एक लोक सभा का विवरण दिया है जिसमें सहयोगियों एवं मित्रों को यह तय करने के लिए आमंत्रित किया गया था कि क्या एथेन्स राज्य ने अपनी सन्धियों का उल्लंघन किया है और यदि किया है तो क्या इसके दण्ड स्वरूप उसके विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी जाये ? इस सभा में वक्तृताओं की समाप्ति के बाद युद्ध का प्रस्ताव पहले कण्ठ स्वर से और फिर मतगणना के आधार पर पारित हो गया। उल्लेखनीय बात यह थी कि इसी समय स्पार्टा में एथेन्सवासी प्रतिनिधि-मण्डल किसी व्यापारिक सन्धि के सन्दर्भ में आया हुआ था और उक्त सभा में निमंत्रित न होते हुए भी उपस्थित था। इसे बीच-बीच में अपना मत व्यक्त करने दिया जाता था। जब युद्ध विषयक प्रस्ताव पारित हो गया तो इस प्रतिनिधि मण्डल के सदस्य शत्रु राज्य के नागरिक बन गये, फिर भी इनको उस समय तक स्पार्टा में रहने दिया गया जब तक कि उन्होंने अपना सन्धि-विषयक कार्य पूरा नहीं कर लिया।
यूनानी राजनयज्ञ ये कार्य सम्पन्न करते थे – स्वागतकर्त्ता राज्य में सम्बन्धित सूचना एकत्रित करना, लोकप्रिय नगर सभाओं के सम्मुख अपने राज्य के हितों के समर्थन में सभी तरीके अपनाना, विदेशी राज्य के सम्बन्ध में सामयिक प्रतिवेदन तैयार करना, विदेशी राज्य में अपने राज्य के नागरिकों के हितों की रक्षा करना आदि। उस समय थ्यूसीडाइड्स द्वारा राजनयज्ञ के रूप में सम्पन्न किये गये कार्य हमारे अध्ययन के लिये पर्याप्त उपयोगी हैं। उसने विवादों को शान्तिपूर्वक हल करने के लिए सन्धिवार्ता और सम्मेलनात्मक राजनय के तरीके अपनाये। नगर राज्यों में स्पार्टा तथा एथेन्स प्राचीनतम थे। यहाँ अन्य राज्यों के साथ सम्बन्धों की अच्छी परम्पराएं विकसित हुईं। एथेन्स संगठन और भावना की दृष्टि्र से प्रजातंत्रात्मक था। यहाँ व्यापारिक एवं समुद्रमार्गीय सम्पर्क की दृष्टि्र से निवासियों को तीन भागों में वर्गीकृत किया गया-दास, विदेशी निवासकर्त्ता और एथेन्स के नागरिक। अन्य राज्यों के साथ उसके सम्पर्क का रूप प्रजातंत्रात्मक था। यहां का राजनय व्यापार, वाणिज्य और सुरक्षा सम्बन्धी आवश्यकताओं से प्रभावित था। यूनान के इन नगर राज्यों द्वारा राजनयज्ञों को अनेक उन्मुक्तियां एवं विशेषाधिकार सौंपे जाते थे। प्रारम्भ से ही विदेश सम्बन्धों की रचना में इन राजनयिकों का योगदान न केवल महत्वपूर्ण वरन् व्यापक भी था।
यूनानी नगर राज्यों के आपसी सम्बन्धों ने अनेक रीति रिवाजों एवं सिद्धान्तों को जन्म दिया। उस समय अन्तर्राष्ट्रीय कानून अपनी शिशु अवस्था में था। एथेन्स स्पार्टा एवं थेब्स आदि नगार राज्यों ने आपसी सम्बन्धों का विकास अपनी आन्तरिक नीति, सुविधा और सुरक्षा सम्बन्धी रणनीति को ध्यान में रखकर किया। आधुनिक अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों के बीच तत्कालीन धार्मिक और राजनीतिक संघों में देखे जा सकते है। ं उस काल में राजनयज्ञों की अनतिक्रम्यता, शरणदान का अधिकार, मृतकोें के दाह-संस्कार के लिए युद्ध विराम तथा धार्मिक मेलोें और खेलोें के समय तनाव को रोक देना आदि परम्परायें अपनाई जाती थी। नगर राज्यों की जनप्रिय सभाओं में विदेशों से स्वदंश के राजदूतों द्वारा भेजे गये प्रतिवेदनों पर आलोचनात्मक विचार किया जाता था। उनके सुझावोें द्वारा प्रस्तुत समस्याओं पर विचार करके आवश्यक निर्देश् दिये जाते थे। राज्योें के बीच विवाद उत्पन्न होने पर पंच फैसले द्वारा उसके समाधान की परम्पराएं पड़ चुकी थीं। अन्तर्राष्ट्रीय जीवन को नियमित करने की दृष्टि्र से यूनानियों द्वारा विकसित दो प्रक्रियायें उल्लेखनीय हैं –

(क) ये शक्ति के आधार पर शान्ति की स्थापना करते थे। बाद में रोमन सम्राटों ने भी इस व्यवहार को अपनाया।
(ख) वे न्यायाधिकरण द्वारा विवादों को सुलझाने के लिए शान्ति सन्धियां करते थे और उनके द्वारा स्वतन्त्र राज्यों की शक्ति को नियन्ति्रत करके शक्ति सन्तुलन की स्थापना करते थे।
यूनानी नगर राज्यों के राजनयिक व्यवहार को संक्षेप में निम्न प्रकार वर्णित किया जा सकता है-
(1) यूनानी काल में राजनयिक संधि वार्तायें मौखिक रूप से हुआ करती थीं। सिद्धान्त रूप में इन वार्ताओं का पूरा प्रचार किया जाता था।
(2) सन्धियां खुले में की जाती थीं तथा उनके अनुसमर्थन के लिए दोनों पक्ष सार्वजनिक रूप से शपथों का आदान-प्रदान करते थे। गुप्त संधियां अपवाद स्वरूप में थी। उनको उचित नहीं समझा जाता था।
(3) यूनानी नगर राज्य तटस्थता और पंच फैसले से पूर्ण रूप से परिचित थे। तटस्थता का अर्थ था चुप बैठ जाना। वे विवादों को तय करने के लिए पंच फैसले की प्रक्रिया अपनाते थे। 300 से लेकर 100 वर्ष ईसा पूर्व तक के काल में पंच फैसले के 46 मामलों का उल्लेख मिलता है।
(4) यूनानी नगर राज्यों द्वारा विकसित सर्वाधिक उपयोगी संस्था वाणिज्य दूतों (Consuls or Proxenos) की है। वे वाणिज्य दूत उसी नगर के मूल निवासी होते थे जहां इनको रखा जाता था। ये अपने राज्य में नियुक्तिकर्ता राज्य के हितों की देखभाल करते थे। उनका पद पर्याप्त सम्मानजनक समझा जाता था और अनेक प्रतिभाशाली लोगों ने प्रसन्नतापूर्वक इस पद पर कार्य किया है। यह पद प्रायः वंश परम्परागत बन जाता था। इन पदाधिकारियों का कार्य न केवल सम्बन्धित देश के व्यापारियों के हितों की देखभाल करता था वरन् ये राजनयिक सन्धि वार्ताओं की पहल भी करते थे। पांचवी शताब्दी ई0 तक यूनानियों ने अन्तर्राष्ट्रीय सम्पर्क का उच्च स्तर प्राप्त कर लिया था। वे आपसी सहयोग एवं सगठन के महत्व से परिचित थे। उन्होंने युद्ध की घोषणा, शान्ति स्थापना, सन्धियों का अनुसमर्थन, पंच फैसला, तटस्थता, राजदूतों का आदान-प्रदान, वाणिज्य दूतों के कार्य, युद्ध के कुछ नियम आदि से सम्बन्धित सामान्य सिद्धान्तों का विकास कर लिया था। वे विदेशियों की स्थिति नागरिकतादान, शरणदान, प्रत्यर्पण एवं समुद्र-व्यापार आदि से सम्बन्धित विषयों को परिभाषित कर चुके थे।
यूनानी काल के राजनय की आलोचना करते हुए कभी-कभी यह कहा जाता है कि यूनानी लोग अन्तर्राष्ट्रीय नैतिकता की धारणा से अपरिचित थे जिसके बिना श्रेष्ठ राजनयिक यंत्र भी निष्कि्रय सिद्ध होता है, औसतन यूनानी की नगर राज्य के प्रति स्वामीभक्ति इतनी गहरी होती थी कि वह अन्य नगर राज्य वासियों को अपना सम्भावित शत्रु और शेष असभ्यों को स्वाभाविक दास मानता था। राजनयिक सम्बन्धों की विभिन्न उल्लेखनीय धारणाओं के होते हुए भी यूनानियों का राजनयिक आचार कई दृष्टि्रयों से दोषपूर्ण था-
(1) वे परस्पर इतने ईर्ष्यालु थे कि इसके कारण उनकी आत्म रक्षा की आवश्यकता को भी हानि पहुंचती थी।
(2) यूनानी लोग स्वाभाववश अच्छे राजनयज्ञ नहीं थे। अत्यन्त चतुर चालाक होने के कारण वे अत्यधिक संदेहशील थे। फलतः उनके बीच अविश्वास के कारण कोई सन्धिवार्ता सफल नहीं हो पाती थी।
(3) यूनानी नगर राज्यों में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका के दायित्वों का सही वितरण न होने के कारण राजनयिक कार्यों में कठिनाईयां एवं भ्रम पैदा हो जाते थे। यूनानी यह नहीं खोज पाये कि प्रजातंत्रात्मक राजनय को स्वेच्छाचारी राजनय की भांति कैसे कार्यकुशल बनाया जा सकता है। यही गलती उनके विनाश का कारण बन गई। प्रजातन्त्रात्मक व्यवस्था होने के कारण उनके निर्णय गुप्त नहीं होते थे और तुरन्त नहीं लिये जाते थे। उनके राजदूत सर्वशक्ति सम्पन्न नहीं होते थे। अतः छोटे-छोटे निर्णयों में भी देरी हो जाती थी। उस काल की जनसभाएं अनुत्तरदायी थी। वे स्वयं के निर्देशानुसार कार्य करने वाले राजदूत के कार्यों को भी रद्द कर देती थी।
संक्षेप में, यूनानियों ने राजनयिक आचार के क्षेत्र में काफी उन्नति कर ली थी।

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