लोकतंत्र में जनतंत्र तथा शिक्षा के उद्देश्य

जनतंत्र में शिक्षा के निम्नलिखित उद्देश्य होते हैं –
(1) जनतंत्र के मूल्यों का विकास – जनतंत्र की सफलता विशाल भवनों, विधान-सभाओं, विधान-परिषदों तथा सांसदों से नहीं होती अपितु ऐसे नागरिकों से होती है जो जनतंत्र के मूल्यों का पालन करते हों।इस दृष्टि से जनतंत्रीय शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बालकों में जनतंत्र के मूल्यों का विकास करना है।कोई भी पुस्तकीय ज्ञान उस उद्देश्य को उस समय तक प्राप्त नहीं कर सकता जब तक बालकों को स्कूल से उपयुक्त अवसर न प्रदान किये जायें।वस्तु-स्थिति यह है कि बालक जनतांत्रिक ढंग से रहना उसी सके सीख सकता है जब उसे जनतंत्रीय ढंग से रहने के अवसर उपलब्ध हों।अत: स्कूल का सम्पूर्ण वातावरण अर्थात प्रत्येक क्रिया पाठ्यक्रम सम्बन्धी अथवा सहगामी, हर प्रकार से सम्बन्ध, चाहे वे बालकों के आपसी हों अथवा शिक्षकों और बालकों के, जनतंत्रीय मूल्यों के अनुसार होने चाहिये |
(2) उत्तम अभिरुचियों का विकास – जनतंत्रीय शिक्षा का दूसरा उद्देश्य बालकों में उत्तम तथा उपयोगी अभिरुचियों का विकास करना है।रुचियाँ बालक के चरित्र का निर्माण करती है तथा उसको जीवन सम्पन्नता प्रदान करती है।इसीलिए प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री हरबार्ट ने बहुमुखी रुचियों के विकास पर बल दिया है।इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए बालकों को विभिन्न प्रकार की क्रियाओं को करने के लिए अवसर मिलने चाहिये।विभिन्न क्रियाओं में भाग लेने से उनकी कार्य में रूचि जागृत होगी।ध्यान देने की बात है कि बालक में जितनी अधिक उपयुक्त एवं श्रेष्ट अभिरुचियाँ विकसित हो जायेंगी वह उतना ही अधिक सुखी, कुशल तथा सन्तुलित जीवन व्यतीत कर सकेगा |
(3) व्यवसायिक कुशलता का विकास – जनतंत्र की सफलता के लिए नागरिकों का आर्थिक दृष्टि से हीन व्यक्ति अपने असली लक्ष्य से विमुख हो सकता है तथा धनवानों के हाथ का खिलौना बनकर अपने बहुमूल्य वोट को भी अवांछनीय व्यक्ति को दे सकता है।अत: जनतंत्रीय शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात वे किसी व्यवसाय को अपनाकर अपना भार स्वयं ही वहन करते हुए राष्ट्र की यथाशक्ति सेवा कर सकें |
(4) अच्छी आदतों का विकास – जनतंत्रीय शिक्षा का चौथा उद्देश्य बालकों में अच्छी आदतों का विकास करना है।इसका कारण यह है कि आदतें ही अच्छे अथवा बुरे कार्यों की नीवं डालती है।अत: जनतन्त्र को सफल बनाने के लिए बालकों में आरम्भ से ही अच्छी आदतों का विकास करना चाहिये |
(5) विचार शक्ति का विकास – जनतंत्रीय शिक्षा का पांचवां उद्देश्य बालकों में अच्छी आदतों का विकास करना है।इसका कारण है कि आज के बालक कल के नागरिक हैं।इन्हीं बालकों को निकट भविष्य में राष्ट्र की राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक समस्याओं पर विचार करना है।अत: इन्हें शिक्षा के द्वारा आरम्भ से ही विभिन्न समस्याओं के विषय में स्वतंत्रतापूर्वक विचार करने तथा अपना निजी निर्णय लेने की आदत डालनी चाहिये |
(6) सामाजिक दृष्टिकोण का विकास – सामाजिक दृष्टिकोण का विकास करना जनतंत्रीय शिक्षा का छठा महत्वपूर्ण उद्देश्य है।इस उद्देश्य का तात्पर्य यह है कि प्रत्येक बालक यह समझने लगे कि वह समाज आ अंग है तथा उसका सम्पूर्ण जीवन समाज के ही लिए है।इस भावना के विकसित हो जाने से वह समाज-हित के लिए अपने निजी हित को त्यागने में कोई संकोच नहीं करेगा।अत: इस उद्देश्य के अनुसार शिक्षा में ऐसी क्रियाओं को महत्त्व दिया जाना चाहिये जिनके द्वारा बालकों को सामाजिक अभिरुचियाँ विकसति हो जायें वे अपने सहयोगीयों से प्रेमपूर्ण व्यवहार करना सीख जायें तथा उनमें उतरदायित्वों को समझने एवं उनके पालन करने की भावना विकसित हो जाये |
(7) व्यक्तित्व का सामंजस्यपूर्ण विकास- जनतंत्रीय शिक्षा का सातवाँ उद्देश्य व्यक्तित्व का सामंजस्यपूर्ण विकास करना है।इसका कारण यह है कि वर्तमान संसार संघर्षों तथा कटुताओं का संसार है।ऐसे संसार में सामंजस्यपूर्ण व्यक्तित्व वाला व्यक्ति ही सफल हो सकता है।अत: शिक्षा को बालक के व्यक्तित्व का सामंजस्यपूर्ण विकास करना चाहिये जिससे वह एक चरित्रवान, योग्यता तथा सबल नागरिक के रूप में अपना विकास तथा समाज का कल्याण कर सके।हुमायूँ कबीर ने ठीक ही लिखा है – “शिक्षा को मानव प्राकृति के सब पहलुयों के लिए सामग्री जुटानी चाहिये तथा मानवशास्त्र, विज्ञान एवं प्रौधोगिकी को समान महत्त्व देना चाहिये जिससे कि वह मनुष्य को सब कार्यों को निष्पक्षता, कुशलता तथा उदारता से करने के योग्य बना सकें।“
(8) नेतृत्व का विकास – जनतंत्रीय शिक्षा का आठवाँ उद्देश्य बालकों में नेतृत्व का विकास करना है।इसका कारण यह है कि आज के बालक शासन की बागडोर अपने हाथों में सम्भालेंगे।अत: जनतंत्र को सफल बनाने के लिए शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार करनी चाहिये कि वे बड़े होकर नागरिक के रूप में देश के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक आदि सभी क्षेत्रों का कुशलतापूर्वक नेतृत्व कर सकें |
(9) राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय भावना का विकास – जनतंत्र को सफल बनाने के लिए शिक्षा का नवां उद्देश्य बालकों में राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय भावना का विकास करना है।ध्यान देने की बात है कि जनतंत्र जहाँ एक ओर राष्ट्रीय भावना के विकास पर बल देना है वहाँ दूसरी ओर वह अपनी सफलता के लिए अंतर्राष्ट्रीय भावना का संचार करना भी अपना परम कर्त्तव्य समझता है।इसका कारण यह है कि आधुनिक युग में कोई राष्ट्र अकेला जीवित नहीं रह सकता।उसे अपने निजी अस्तित्व को बनाये रखने के लिए संसार के अन्य राष्ट्रों से भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाये रखना आवश्यक है।अत: शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार से की जानी चाहिये कि जहाँ बालकों में एक ओर राष्ट्रीय भावना विकसित हो, वहाँ दूसरी ओर उनमें अंतर्राष्ट्रीय भावना का विकास भी हो जाये |

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