संगमकालीन समाज एवं संस्कृति

राजनैतिक जीवन
संगमकालीन प्रशासन राजतंत्रात्मक था। राजपद वंशानुगत था। राज्य को ‘मंडल’ कहा जाता था। समस्त अधिकार राजा में निहित थे। राजा को मन्नम, वन्दन, कारवेन इत्यादि उपाधियाँ दी गई थीं। ये उपाधियां राजा एवं देवता दोनों के लिए होतीं थीं। राजा के सर्वोच्च न्यायालय या राज्यसभा को ‘मनरम’ कहते थे। राजा का जन्मदिन ‘पेरूनल’ कहलाता था। राजा के दरबार को ‘नलबै’ भी कहा जाता था। सेना के सेनापति को ‘एनाडी’ की उपाधि दी जाती थी। सेना कि अग्र टुकड़ी को तुशी तथा पिछली टुकड़ी को ‘कुले’ कहा जाता था। सेना में वेल्लाल (धनी कृषक) भर्ती किए जाते थे। युद्ध में मरे सैनिकों की स्मृति में पाषाण मूर्तियाँ बनाई जातीं थीं। इस प्रकार की मूर्तियों को ‘नड्डूकल’ या वीरक्कल कहते थे। युद्ध में बन्दी स्त्रियों को दासी बनाकर उनसे मंदिरों में दीपक जलाने का कार्य कराया जाता था।
सामाजिक जीवन
संगम काल में उत्तर भारत की संस्कृति के तत्वों का दक्षिण में प्रसार हुआ। संगम काल के चार वर्ण थे- अरसर (शासक), अंडनार (ब्राह्मण), वेनिगर (वणिक), वेलालर (किसान)। इस काल में भी जाति प्रथा का आधार व्यवसाय ही थे। व्यवसाय का आधार विभिन्न क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति हुआ करती थी। तमिल क्षेत्र में ब्राह्मणों का आगमन सर्वप्रथम संगम काल में ही होता है। भूमि अधिकतर वैल्लाल जाति के हाथों में थी जो धनी कृषक वर्ग था । शासक वर्ग भी वैल्लाल जाति से ही निकलता था। वैल्लाल के प्रमुख को वेलिर कहा जाता था। खेतों में काम करने वाले मजदूरों को कडेसियर कहते थे। वेल्लाल दो वर्गों में विभाजित थे- धनिक कृषक व भूमिहीन वर्ग। चोल राज्य में धनी कृषकों को ‘वेल’ तथा ‘आरशु’ की उपाधि दी जाती थी। पाण्ड्य राज्य में इन्हें ‘कविदी’ की उपाधि दी जाती थी। उच्च सैनिक वर्गों में सती प्रथा का प्रचलन था। अन्तरजातीय विवाह भी प्रचलित था। दास प्रथा भी प्रचलित थी। दासों के लिए नियमित बाजार लगते थे। गायक व नर्तकों को पार और विडेलियर कहा था।
आर्थिक जीवन
संगम काल में कृषि, पशुपालन व शिकार जीविका के मुख्य आधार थे। दक्षिण भारत में अगस्त्य ऋषि द्वारा कृषि का विस्तार किया गया। जहाजों का निर्माण तथा कताई-बुनाई महत्वपूर्ण उद्योग थे । ‘उरैयूर’ सूती वस्त्र उद्योग का महत्वपूर्ण केन्द्र था। अधिकांश व्यापार वस्तु-विनिमय में होता था। बाजार को ‘अवनम’ कहते थे। पाण्ड्य राज्य के प्रमुख बंदरगाह शालीयुर, कोरकाय आदि थे। चोल राज्य के प्रमुख बंदरगाह पुहार और उरई थे। टालमी ने कावेरी पट्टनम को ‘खबेरिस’ नाम दिया है। तोंडी, मुशिरी तथा पुहार में यवन लोग बड़ी संख्या में विद्यमान थे। संगम काल में रोम के साथ व्यापार उन्नत अवस्था में था। अरिकामेडु से रोमन लोगों की बस्ती रोमन सम्राट ऑगस्टस व टिवेरियस की मुहरें मिली हैं। पेरिप्लस ने अरिकामेडु को ‘पोडुका’ कहा है। पश्चिमी देशों को काली मिर्च, मसाला , हाथीदांत ,रेशम , मोती, सूती वस्त्र, मलमल आदि का निर्यात किया जाता था। आयातित वस्तुओं में सिक्के, पुखराज, छपे हुए वस्त्र, शीशा, टीन, तांबा व शराब प्रमुख थे। पुहार एक सर्वदेशीय महानगर था । यहां विभिन्न देशों के नागरिक रहते थे । संगम काल में दक्षिण भारत का मलय द्वीपों व चीन के साथ भी व्यापार था। यूनान के दक्षिण भारत के साथ व्यापार के कारण ग्रीक भाषा में चावल, अदरक आदि शब्द तमिल भाषा से लिए गए थे। पेरिप्लस में संगम युग के 24 बंदरगाहों का उल्लेख किया है जो सिन्ध नदी के मुहाने से लेकर कन्याकुमारी तक विस्तृत थे। भूमि मापन की इकाई वैली या माहोती थी। अंबानम अनाज का माप था। नाली ,अल्लाकू और उल्लाक भी छोटे माप थे।
धार्मिक जीवन
संगम युग में दक्षिण भारत में वैदिक धर्म का आगमन हुआ। दक्षिण भारत में मुरुगन की उपासना सबसे प्राचीन है। मुरुगन का एक अन्य नाम सुब्रमणयम भी मिलता है। बाद में सुब्रमणयम का एकीकरण स्कन्ध कार्तिकेय से किया गया। मुरगन का दूसरा नाम वेलन भी था। वेल या बरछी इनका प्रमुख अस्त्र था। मुरगन का प्रतीक मुर्गा था। पहाड़ी क्षेत्र के शिकारियों पर्वत देव के रूप में मुर्गन की पूजा करते थे मुरुगन की पत्नियों में एक कुरवस नामक पर्वतीय जनजाति की स्त्री हैं। परशुराम की माता मरियम्मा, चेचक की देवी थीं। विष्णु का तमिल नाम ‘तिरुमल’ है। किसान मेरूडम इंद्र देव की पूजा करते थे। पुहार के वार्षिक उत्सव में इन्द्र की विशेष पूजा होती थी।
मणिमेखलै में कापालिक शैव सन्यासियों का वर्णन है, इसमें बौद्ध धर्म के दक्षिण में प्रसार का वर्णन है। शिल्पादिकारम में जैन धर्म के संस्थानों का वर्णन है।
शिक्षा
शिक्षा और साहित्य की दृष्टि से संगम युग स्वर्णिम काल कहा जाता है। इस समय समाज में शिक्षा का न केवल प्रचलन था बल्कि ज्ञान जगत के सभी विषय जैसे विज्ञान, कला, साहित्य, व्याकरण,गणित और ज्योतिष,चित्रकला और मूर्तिकला आदि का समुचित ज्ञान दिया जाता था। शिक्षा देने के लिए मन्दिरों को चुना गया था और शिक्षक को ‘कणकट्टम’ तथा शिक्षा पाने वाले ‘पिल्लै’ कहा जाता था। विद्यार्थी शिक्षा पूरी करने के बाद शिक्षकों को ‘गुरु दक्षिणा’ देते थे।

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