चिल्का बचाओ आंदोलन

चिल्का उड़ीसा में स्थित एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है जिसकी लम्बाई 72 कि०मी० तथा चौड़ाई 25 कि०मी० और क्षेत्रफल लगभग 1000 वर्ग कि०मी० है। चिल्का 158 प्रकार के प्रवासी पक्षियों तथा चीते की व्यापारिक रूप से महत्त्वपूर्ण प्रजातियों का निवास स्थान है। यह 192 गांवों की आजीविका का भी साधन है जो मत्स्य पालन खासकर झींगा मछली पर निर्भर हैं। 50,000 से अधिक मछुआरे तथा दो लाख से अधिक जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए चिल्का पर निर्भर है। मछली पालन तो कई शताब्दियों से चिल्का क्षेत्र का परम्परागत पेशा है। मछुआरों को यहाँ मछली पालन का अधिकार अफगानी शासन के समय से प्राप्त है। यहाँ तक कि बिट्रिश शासन में भी मछुआरों के अधिकारों की रक्षा ‘मछुआरों के संघ’ स्थापित कर की गई। अत: चिल्का का प्राचीन समय से मछली उत्पादन, सहकारिता तथा ग्रामीण लोकतंत्र का एक विशेष तथा प्रेरक इतिहास रहा है।
झींगा मछली का उत्पादन तथा निर्यात
1977-78 का वर्ष झींगा मछली के उत्पादन तथा निर्यात के विकास का एक महत्त्वपूर्ण वर्ष था। चिल्का झींगा मछली तथा पैसे का पर्यायवाची शब्द बन गया था। पूरे क्षेत्र को सोने की खान से आंका जाने लगा। इस परिवर्तन से यहाँ पर व्यापारिक आक्रमण दिखाई देने लगा। पहले व्यापारी तथा बिचौलिए फिर राजनीतिज्ञों तथा उड़ीसा के व्यापारिक तथा औद्योगिक घरानों में राज्य सरकार की कृपा से विकास के नाम पर इस क्षेत्र को हथियाने की होड़ लग गई।
1986 में, तत्कालीन जे०बी० पटनायक सरकार ने निर्णय लिया कि चिल्का में 1400 हेक्टेयर झींगा प्रधान क्षेत्र को टाटा तथा उड़ीसा सरकार की संयुक्त कम्पनी को पट्टे पर दिया जाएगा। उस समय इस निर्णय का विरोध मछवारों के साथ-साथ विपक्षी राजनीतिक पार्टी जनता दल ने भी किया। जिसके कारण जनता दल को विधानसभा की सभी पांचों सीटें जीतने में मदद मिली। लेकिन 1989 में जनता दल के सत्ता में आने पर स्थिति फिर बदल गई। इस घटना ने राजनीतिक दलों की दोहरी भूमिका तथा आर्थिक शक्तियों के किसी भी राजनीतिक दल में पैठ लगाने की शक्ति को स्पष्ट किया। 1991 में जनता दल की सरकार ने चिल्का के झींगा प्रधान क्षेत्र के विकास के लिए टाटा कंपनी को संयुक्त क्षेत्र कंपनी बनाने के लिए आंमत्रित किया। सरकार ने 50000 मछुआरों तथा दो लाख लोगों के हितों के बारे में जरा भी नहीं सोचा जो कई सदियों से अपने जीवन निर्वाह के लिए चिल्का पर निर्भर थे। सरकार ने इस प्रक्रिया द्वारा पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भी परवाह नहीं की।
इस प्रकार सन 1991 में एक संघर्ष ने जन्म लिया। चिल्का के 192 गांवों के मछुआरों ने ‘मत्स्य महासंघ’ के अंतर्गत एकजुट होकर अपने अधिकारों की लड़ाई शुरू की। इस संघर्ष में उनका साथ उट्टकल विश्वविद्यालय के छात्रों ने भी दिया। 15 जनवरी, 1992 में गोपीनाथपुर गांव में यह संघर्ष जन आंदोलन में तब्दील हो गया। ‘चिल्का बचाओ आंदोलन’ ने विकास के उस प्रतिमान के विरुद्ध संघर्ष किया जिससे क्षेत्रीय पर्यावरण, विकास तथा लोगों की आजीविका को खतरा था।
1992 में 192 गांवों के लोग आजीविका के अधिकार बनाम डॉलर के विरोध में मुख्यमंत्री बीजू पटनायक से मिले। लेकिन काफी समय के बाद भी सरकार की तरफ से काई सकारात्मक जबाब नहीं मिला। अत: चिल्का क्षेत्र की समस्त जनता ने उट्टकल विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा गठित संगठन ‘क्रांतिदर्शी युवा संगम’ के सहयोग से उस बांध को तोडऩा शुरू किया जो चिल्का के अंदर टाटा ने बनवाया था। इस जनआंदोलन को देखते हुए अंतत: उड़ीया सरकार ने दिसम्बर, 1992 को टाटा को दिये गये पट्टे के अधिकार को रद्द कर दिया। इस प्रकार चिल्का बचाओ आंदोलन ने न केवल स्थानीय पर्यावरण बल्कि लोगों के परम्परागत अधिकारों को पाने में भी सफलता हासिल की।

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