पाषाण युग का सम्पूर्ण इतिहास भाग – 2

मध्यपाषाण काल (Mesolithic Era)
मध्यपाषाण काल (अंग्रेजी Mesolithic) मनुष्य के विकास का वह अध्याय है जो पुरापाषाण काल और नवपाषाण काल मे मध्य मे आता है। इतिहासकार इस काल को 12,000 साल पूर्व से लेकर 10,000 साल पूर्व तक मानते है।
12,000 साल से लेकर 10,000 साल पूर्व तक। इस युग को माइक्रोलिथ (Microlith) अथवा लधुपाषाण युग भी कहा जाता हैंं।
इस काल मेंं अग्नि का आविष्कार हुआ था|
इस काल की बस्तिया उत्तरप्रदेश

पाषाण युग और उसके बाद का मानव जीवन संक्षेप में

शैल चित्र
ऐसे ही शैल चित्र उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले के विंध्यपहाड़ी के कंदराओं में भी मिला। जिसे सीता कुंड नामक स्थान jo mirzapur aur allahabad ke raste me pdta hai पर 12 फरवरी 2014 को एक गुमनाम पत्रकार शिवसागर बिंद ने खोज निकाला था। जिसकी पुष्टि के लिए उ० प्र० राज्य पुरातत्व विभाग के क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारियों ने की।

शैल चित्र, सीता कोहबर, जनपद मिर्ज़ापुर
जनपद मुख्यालय मिर्ज़ापुर से लगभग 11-12 किलोमीटर दूर टांडा जलप्रपात से लगभग एक किलोमीटर पहले “सीता कोहबर” नामक पहाड़ी पर एक कन्दरा में प्राचीन शैल-चित्रों के अवशेष प्रकाश में आये हैं। शिव सागर बिंद, जन्संदेश टाइम्स म़िर्जा़पुर सूचना पर उ० प्र० राज्य पुरातत्व विभाग के क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी के साथ उक्त शैलाश्रय का निरीक्षण किया और शैलचित्रों को प्राचीन तथा ऐतिहासिक महत्त्व का बताया।
लगभग पांच मीटर लम्बी गुफा, जिसकी छत 1.80 मीटर ऊँची तथा तीन मीटर चौड़ी है, में अनेक चित्र बने हैं। विशालकाय मानवाकृति, मृग समूह को घेर कर शिकार करते भालाधारी घुड़सवार शिकारी, हाथी, वृषभ, बिच्छू तथा अन्य पशु-पक्षियों के चित्र गहरे तथा हल्के लाल रंग से बनाये गए हैं, इनके अंकन में पूर्णतया: खनिज रंगों (हेमेटाईट को घिस कर) का प्रयोग किया गया है। इस गुफा में बने चित्रों के गहन विश्लेषण से प्रतीत होता है कि इनका अंकन तीन चरणों में किया गया है। प्रथम चरण में बने चित्र मुख्यतया: आखेट से सम्बन्धित है और गहरे लाल रंग से बनाये गए हैं, बाद में बने चित्र हल्के लाल रंग के तथा आकार में बड़े व शरीर रचना की दृष्टि से विकसित अवस्था के प्रतीत होते हैं साथ ही उन्हें प्राचीन चित्रों के उपर अध्यारोपित किया गया है।
यहाँ उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र (मिर्ज़ापुर व सोनभद्र) में अब तक लगभग 290 से अधिक शैलचित्र युक्त शैलाश्रय प्रकाश में आ चुके हैं, जिनकी प्राचीनता ई० पू० 6000 से पंद्रहवी सदी ईस्वी मानी जाती है। मिर्ज़ापुर के सीता कोहबर से प्रकाश में आये शैलचित्र बनावट की दृष्टि से 1500 से 800 वर्ष प्राचीन प्रतीत होते हैं। इन क्षेत्रों में शैलचित्रों की खोज सर्वप्रथम 1880-81 ई० में जे० काकबर्न व ए० कार्लाइल ने ने किया तदोपरांत लखनऊ संग्रहालय के श्री काशी नारायण दीक्षित, श्री मनोरंजन घोष, श्री असित हालदार, मि० वद्रिक, मि० गार्डन, प्रोफ़० जी० आर० शर्मा, डॉ० आर० के० वर्मा, प्रो० पी०सी० पन्त, श्री हेमराज, डॉ० जगदीश गुप्ता, डॉ० राकेश तिवारी तथा श्री अर्जुनदास केसरी के अथक प्रयासों से अनेक नवीन शैल चित्र समय-समय पर प्रकाश में आते रहे हैं। इस क्रम में यह नवीन खोज भारतीय शैलचित्रों के अध्ययन में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी मानी जा सकती है।

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