लिंग निर्धारण का संतुलन सिद्धांत

वनस्पतियों तथा जंतुओं का समुचित अध्ययन करने पर यह पाया गया है कि लिंग का निर्धारण नर और मादा प्रवृत्तियों का ही एकमात्र परिणाम नहीं होता। भ्रूण के विकास के साथ ही साथ नर और मादा निर्धारक तत्व भी समान रूप से ही विकसित होते हैं। कोई प्राणी नर या मादा केवल इसलिए नहीं हो जाता कि उसकी रचना विशेष संख्या वाले क्रोमोसोमों द्वारा हुई होती है, अपितु वह नर या मादा इसलिए भी हो जाता है कि उसने मादा या नर निर्धारक अन्य तत्वों को “दबा” (outweigh) दिया। सभी हॉर्मोनों का उत्पादन शरीर में होता रहता है, अत: जब स्त्रीत्व, या पुरुषत्व निर्धारक हॉर्मोन अधिक शक्तिशाली होंगे तब भ्रूण स्त्री, या पुरुष शरीर तथा प्रवृत्तियों की ओर अग्रसर होगा। हॉर्मोनों के संतुलन का ही यह परिणाम होता है कि प्राणी नर या मादा के रूप में जन्म लेता है। कर्ट स्टर्न (Curt Stern) ने यह दिखलाया है कि यदि किसी स्त्री में दो एक्स के स्थान पर तीन एक्स हों, तो उसमें अपेक्षाकृत अधिक स्त्रीत्व होगा। किंतु ऐसी स्त्री देर में ऋतुवती, अत्यधिक अल्पायु और सर्वथा वंध्या होगी। इसी प्रकार गोल्डश्मिट (Goldschmidt) ने लिमैट्रिया जैपोनिका नामक (Lymantria japonica) शलभ (moth) का अध्ययन कर यह बतलाया है कि जब बलवान नरों का निर्बल कीटों से संयुग्मन होता है तब 50% सामान्य नर और 50% अंतलिंगी मादा (intersexed femal) की उत्पत्ति होती है। किंतु जब अत्यधिक सशक्त नरों का निर्बल मादाओं से संयोग होता है तब 100% नर कीट उत्पन्न होते हैं। प्रो॰ एफ.ए.ई. क्रिउ (F.A.E. Crew) भी कहते हैं कि भ्रूण के लिंग का निर्धारण केवल क्रोमोसोमों से ही न होकर, उनमें पाए जानेवाले जीनों (genes) की तथा अलिंगसूत्रों (autosomes) में पाए जाने वाले जनकों की अंतक्रिया (interaction) से भी होता है, जैसे पक्षियों में मादा विषमलिंगी एक्स वाई (XY) तथा नर समलिंगी एक्स एक्स (XX) होते हैं। कीटों में लैंगिक विभाजन जनन ग्रंथियों पर निर्भर नहीं करता। उनके मुख्य जनकात्मक लक्षण इस प्रकार होते हैं : नर एक्स ओ (XO), या एक्स वाई (XY); मादा (XX) एक्स एक्स। फिंकलर (Finkler) ने सन् 1923 में कुछ नर कीटों के मस्तक काटकर मादाओं पर तथा मादाओं के मस्तक नरों पर लगा दिए। इन प्रयोगों में यह पाया गया कि कीटों ने अपने शरीर के अनुसार नहीं अपितु मस्तक के अनुसार काम किया, अर्थात् नर मस्तक वाली मादाओं ने नर की भाँति तथा मादा मस्तकवाले नरों ने मादा की भाँति लैंगिक लक्षण प्रकट किए।

लैंगिक द्विरूपता (Sexual Dimorphism)

बहुत से जन्तुओं के नर और मादा के आकार एवं स्वरूप में स्पष्ट अन्तर होता है। इसे लैंगिक द्विरूपता कहते हैं।
यह बतलाया जा चुका है कि लैंगिक विकास के तृतीय चरण में नर मादा के भेद प्रकट होने लग गए थे। धीरे-धीरे अंडाशय तथा वृषणों का विकास हुआ और सहायक अंग भी क्रमश: विकसित होते गए। अनेक निम्न जीवों में, तथा वनस्पतियों में भी नर तथा मादा जननांग एक ही शरीर में पाए जाते हैं। ज्यों ज्यों उच्च वर्ग की ओर बढ़ा जाएगा तो यह मिलेगा कि लिंग स्पष्ट ही पृथक् हो गए हैं और नर तथा मादा शरीर की रचना भी पृथक् है।
लैंगिक द्विरूपता का परिचित उदाहरण बोनेलिया विरिडिस (Bonellia viridis) नामक एक समुद्री कृमि है। इसकी मादा हरे रंग की तथा आकृति में बेर जैसी होती है। समुद्र के तल में पत्थरों के नीचे या उनके छिद्रों में, यह कृमि निवास करता है। वहीं से अपनी द्विशाखित (bifurcated) शुंड (proboscis) को बाहर लहराते हुए यह जीव आहार ढूँढता रहता है। नर कृमि अत्यंत सूक्ष्म होता है और जननांगों के अतिरिक्त इसके अन्य सभी अंगों का ह्रास हो गया होता है। मादा के शरीर के भीतर नर कृमि परोपजीवी की भाँति रहता है। निषेचित अंडाशय विकसित होकर जल में स्वतंत्र रूप से तैरते हुए लार्वा की भाँति होते हैं। यदि कोई लार्वा समुद्रतल में बैठ जाता है, अथवा किसी मादा के शुंड में पहुँच नहीं पाता है, तो वह मादा के रूप में विकसित होने लगता है। किंतु यदि किसी प्रकार वह मादा के शुंड में आकर्शित होकर पहुँच जाता है, तो वह नर के रूप में विकसित होता है। मादा के शुंड में बंदी बौना नर, सरकते हुए उसे मुँह में तथा वहाँ से भी धीरे धीरे नीचे सरकते हुए मादा की जनन नलिका में पहुँचकर, डिंबाशयों को निषेचित करता है। निषेचित अंडाशय पुन: जल में त्याग दिए जाते हैं और स्वतंत्र रूप से लार्वा की भाँति तैरने लग जाते हैं।
इसी प्रकार सैकुलाइना (Sacculina) नामक एक परजीवी क्रस्टेशिया (crustacea) नर तथा मादा केकड़ों पर आश्रित रहता है। गियार्ड (1887 <Ç.) तथा स्मिथ (1906 ई.) ने लिखा है कि इस क्रस्टेशिया का शरीर केकड़े के उदर में पलता है और कुछ भाग शरीर भेदकर बाहर भी निकल आता है। जिस केकड़े के शरीर में यह घुसता है, उसके जननांगों को यह चूस डालता है। इसके कारण वह वंध्या हो जाता है। अधिकांश केकड़े मर जाते हैं, कुछ नर मादा गुणों से युक्त हो जाते हैं, अथवा मादा केकड़े अंतर्लिंगी बनकर वृषण तथा डिंबाशय दोनों उत्पन्न करने लग जाते हैं।

लिंग सहलग्न वंशागति (Sex-linked Inheritance)

लिंग सहलग्नता का अर्थ है, लैंगिक क्रोमोसोमों में पाए जानेवाले जीनों के अनुसार लिंगों में विभिन्नता। इन जीनों पर जो गुण या विशेषक (traits) निर्भर करते हैं, उन्हें लिंग सहलग्नता कहते हैं। इन गुणों या विशेषकों की पारेषण विधि को लिंग सहलग्न वंशागति कहते हैं, जैसे पुरुष में एक्स वाई (XY) तथा स्त्री में एक्स एक्स (XX) क्रोमोसोम होते हैं। कोई पुरुष यदि किसी आनुवंशिक दोष से दूषित है, तो केवल उसके पुत्र ही उस दोष को वंशगति में ग्रहण कर सकते हैं, पुत्रियाँ नहीं। सर्वप्रथम डॉंकास्टर (Doncaster) ने सन् 1908 में इस विषय पर प्रकाश डाला था। उन्होंने एक शलभ अब्रैक्सैस लैक्टिकलर (Abraxas lacticolor) की मादा का अब्रैक्सस ग्रॉस्सुलैरियाटा (Abraxas grossulariata) के नर से संयोग कराया। परिणामस्वरूप प्रथम पीढ़ी में सभी शलभ ग्रॉस्सुलैरियाटा वर्ग के कीट पाए गए। दूसरी पीढ़ी में ग्रॉस्सुलैरियाटा तथा लैक्टिकलर के अनुपात 3:1 थे, किंतु सभी लैक्टिकलर मादा निकले। इससे पता चला कि इस प्राणी में नर एक प्रकार के युग्मक (gametes) उत्पन्न करता है, किंतु मादा दो प्रकार के। अत: नर समयुग्मजी (homozygous) तथा मादा विषमयुग्मजी (Heterozygous) होती है। ब्रैवेल (Brambell) कहते हैं कि एक्स (X) क्रोमोसोम में कुछ अन्य प्रकार के आनुवंशिक कारक तथा जीन होते हैं। यदि यह सिद्धांत ठीक है, तो समयुग्मजी माता पिता के विशेषक (traits) उनके विषमयुग्मजी संतानों में चले जाएँगे। इस सिद्धांत को लिंग सहलग्नता (Sex linkage) कहा जाता है, जैसे फलमक्खी ड्रॉसोफिला (Drosophila) की मादा में दो एक्स (X) तथा नर में एक्स वाई (XY) क्रोमोसोम पाए जाते हैं। इसके एक्स (X) क्रोमोसोमों में लाल आँखों के जीन होंगे, या श्वेत आँखों के। लाल आँख वाले जीनों को प्रभावी (dominant) तथा श्वेत को अप्रभावी (recessive) कहते हैं। अत: जब श्वेत तथा लाल आँखों वाली मक्खियों का संयुग्मन होता है, तब लाल आँखों वाली संतान अधिक होती है। लिंग सहलग्नी रोगों में हीमोफिलिया (haemophilia) तथा रंगांधता (colour blindness) प्रमुख रोग माने जाते हैं।

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