ग्लोबल वार्मिंग और इससे पड़ने वाले गंभीर प्रभाव

भूमंडलीय ऊष्मीकरण (या ग्‍लोबल वॉर्मिंग) का अर्थ पृथ्वी की निकटस्‍थ-सतह वायु और महासागर के औसत तापमान में 20वीं शताब्‍दी से हो रही वृद्धि और उसकी अनुमानित निरंतरता है। पृथ्‍वी की सतह के निकट विश्व की वायु के औसत तापमान में 2005 तक 100 वर्षों के दौरान 0.74 ± 0.18 °C (1.33 ± 0.32 °F) की वृद्धि हुई है। जलवायु परिवर्तन पर बैठे अंतर-सरकार पैनल ने निष्कर्ष निकाला है कि “20 वीं शताब्दी के मध्य से संसार के औसत तापमान में जो वृद्धि हुई है उसका मुख्य कारण मनुष्य द्वारा निर्मित ग्रीनहाउस गैसें हैं।

जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, धरती के वातावरण के तापमान में लगातार हो रही विश्वव्यापी बढ़ोतरी को ‘ग्लोबल वार्मिंग’ कहा जा रहा है। हमारी धरती सूर्य की किरणों से उष्मा प्राप्त करती है। ये किरणें वायुमंडल से गुजरती हुईं धरती की सतह से टकराती हैं और फिर वहीं से परावर्तित होकर पुन: लौट जाती हैं। धरती का वायुमंडल कई गैसों से मिलकर बना है जिनमें कुछ ग्रीनहाउस गैसें भी शामिल हैं। इनमें से अधिकांश धरती के ऊपर एक प्रकार से एक प्राकृतिक आवरण बना लेती हैं जो लौटती किरणों के एक हिस्से को रोक लेता है और इस प्रकार धरती के वातावरण को गर्म बनाए रखता है। गौरतलब है कि मनुष्यों, प्राणियों और पौधों के जीवित रहने के लिए कम से कम 16 डिग्री सेल्शियस तापमान आवश्यक होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्रीनहाउस गैसों में बढ़ोतरी होने पर यह आवरण और भी सघन या मोटा होता जाता है। ऐसे में यह आवरण सूर्य की अधिक किरणों को रोकने लगता है और फिर यहीं से शुरू हो जाते हैं ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव।

आईपीसीसी द्वारा दिये गये जलवायु परिवर्तन के मॉडल इंगित करते हैं कि धरातल का औसत ग्लोबल तापमान 21वीं शताब्दी के दौरान और अधिक बढ़ सकता है। सारे संसार के तापमान में होने वाली इस वृद्धि से समुद्र के स्तर में वृद्धि, चरम मौसम में वृद्धि तथा वर्षा की मात्रा और रचना में महत्वपूर्ण बदलाव आ सकता है। ग्लोबल वार्मिंग के अन्य प्रभावों में कृषि उपज में परिवर्तन, व्यापार मार्गों में संशोधन, ग्लेशियर का पीछे हटना, प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा आदि शामिल हैं।

शब्दावली

“ग्लोबल वॉर्मिंग” से आशय हाल ही के दशकों में हुई वार्मिंग और इसके निरंतर बने रहने के अनुमान और इसके अप्रत्‍यक्ष रूप से मानव पर पड़ने वाले प्रभाव से है। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र समझौते की रूपरेखा में “मानव द्वारा किए गए परिवर्तनों के लिए “जलवायु परिवर्तन और अन्‍य परिवर्तनो के लिए “जलवायु परिवर्तनशीलता” शब्‍द का इस्तेमाल किया है। यह शब्द ” जलवायु परिवर्तन ” मानता है कि बढ़ते तापमान ही एकमात्र प्रभाव नहीं हैं यह शब्द ” एन्थ्‍रोपोजेनिक ग्लोबल वॉर्मिंग ” कई बार प्रयोग उस समय प्रयोग किया जाता है जब मानव प्रेरित परिवर्तन पर ध्यान केंद्रित होता है।

ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण

पृथ्वी की जलवायु बाहरी दबाव के (orbital forcing) चलते परिवर्तित होती रहती है जिसमें सूर्य के चारों ओर इसके अपनी कक्षा में होने वाले परिवर्तन भी शामिल हैं। कक्षा पर पड्ने वाले दबाव सौर चमक (solar luminosity), ज्वालामुखी उदगार, तथा वायुमंडलीसय ग्रीनहाउस गैसों के अभिकेंद्रण (greenhouse gas) को भी परिवर्तित करता है। वैज्ञानिक आम सहमति (scientific consensus) होने के बाद भी हाल ही में हुई गर्मी में वृद्धि के विस्तृत कारण (causes of the recent warming) शोध का विषय होते हैं यह है कि मानवीय गतिविधियों के कारण वातावरण की ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि से होने वाली अधिकांश गर्मी को औद्योगिक युग की शुरुआत के बाद से देखा गया। हाल ही के 50 वर्षो को यह श्रेय स्पष्‍ट तौर पर जाता है जिसके लिए आंकडा उपलब्ध हैं। आम सहमति के विचार से अलग कुछ अन्य संकल्पनाओं (hypotheses) का सुझाव अधिकांश तापमान वृद्धि की व्याख्‍या करने के लिए दिया जाता है। ऐसी ही एक परिकल्पना का प्रस्ताव है कि गर्मी अलग अलग रूपों में सौर गातिविधि का परिणाम हो सकती है।

बाध्‍यता का कोई भी प्रभाव तात्कालिक नहीं है। धरती के महासागरों का ताप जड़त्व (thermal inertia) और कई अप्रत्यक्ष प्रभावों की धीमी प्रतिक्रिया का मतलब है धरती का वर्तमान तापमान उसपर डाले गए दबाव के साथ संतुलन में नहीं है जलवायु वचनबद्धता (Climate commitment) के अध्‍ययनों से प्रदर्शित्‍ होता है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों को 2000 स्‍तर पर स्थिर कर दिया जाए तो इससे आगे भी कुछ सीमा तक। गर्मी दिखाई देगी

वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसें

ग्रीनहाउस प्रभाव की खोज 1824 में जोसेफ फोरियर द्वारा की गई थी तथा 1896 में पहली बार स्वेन्‍टी आरहेनेस (Svante Arrhenius) द्वारा इसकी मात्रात्मक जांच की गई थी। यह प्रक्रिया द्वारा जो अवशोषण (absorption) और उत्सर्जन के अवरक्त विकिरण द्वारा वातावरण में गर्म गैसें वातावरण में एक और ग्रह की सतह कम है।

ग्रीनहाउस प्रभाव के रूप में अस्तित्व इस प्रकार विवादित नहीं है। स्वाभाविक रूप से ग्रीन हाउस गैसों के पास होने का मतलब है एक गर्मी के प्रभाव के बारे में 33 डिग्री सेल्सियस (59 °F), जो पृथ्वी पर रहने योग्य नहीं होंगे। .पृथ्वी पर महत्वपूर्ण ग्रीन्हौसे गैसें हैं, जल-वाष्प (water vapor), जो कि 36–70 प्रतिशत तक greenhouse प्रभाव पैदा करता है (बादल इसमे शामिल नही हैं (not including clouds)) ; carbon dioxide (CO2) जो 9-26 प्रतिशत तक greenhouse प्रभाव पैदा करता है; methane (methane) (CH4) 4-9 प्रतिशत तक और ozone, जो 3-7 प्रतिशत तक प्रभाव पैदा करती है I मुद्दा यह है कि मानवीय गतिविधियों से जब कुछ ग्रीनहाउस गैसों की वायुमंडलीय सांद्रता बढ़ती है तब ग्रीनहाउस प्रभाव की शक्ति कैसे परिवर्तित होती है।

औद्योगिक क्रांति के बाद से मानवी गतिविधि में वृद्धि हुई है जिसके कारण ग्रीन हाउस गैसों कि मात्रा में बहुत जियादा वृद्धि हुई है, इसके कारण विकरणशील बाध्य (radiative forcing) CO से2, मीथेन (methane), tropospheric ओजोन, सीएफसी (CFC) और s nitrous भी बहुत बढ़ गए हैं (nitrous oxide)Iअगर अणु (Molecule) कि दृष्टि से देखें तो मीथेन ग्रीनहाउस गैस carbon dioxide की तुलना में अधिक प्रभावी है, पर उसकी सांद्रता इतनी कम है कि उसका विकरणशील ज़ोर (radiative forcing) कार्बन डाइऑक्‍साइड कि तुलना में केवल एक चौथाई है प्राक़तिक रूप से उत्पन्न होने वाली कुछ दूसरी गैसे ग्रीनहाउस प्रभाव में योगदान देती हैं। इन्‍में से एक नाइट्रस ऑक्साइड (nitrous oxide) (N2O) कृषि जैसी मानवीय गतिविधियों के कारण अपना विकास कर रही है!CO2 और CH4 की वातावरण सांद्रता (atmospheric concentrations) 1700 वीं सदी के मध्‍य में औद्योगिक क्रांति की शुरुआत के बाद से क्रमशः 31% और 149% बढ़ गई है। पिछले 650,000 वर्षों के दौरान किसी भी समय से इन स्तरों को काफी अधिक माना जा रहा है। यह वह अवधि है जिसके लिए विश्वसनीय आंकड़े आइस कोर् (ice core)s. से निकाले गए हैं। कम प्रत्यक्ष भूवैज्ञानिक प्रमाण से यह माना जाता है कि CO2 की इतनी ज्यादा मात्रा पिछली बार 20 करोड़ वर्ष पहले हुई थी। जीवाश्‍म ईंधन (Fossil fuel) के जलने से पिछले 20 वर्षों में मानवीय गतिविधियों से CO2 में हुई बढोतरी में कम से कम एक तिहाई वृद्धि है। शेष कार्य भूमि के उपयोग में परिवर्तन के कारण से होता है विशेषकर वनों की कटाई से ऐसा होता है।

CO2 की वर्तमान वासयुमंडलीय सांद्रता आयतन की दृष्टि से लगभग 385 प्रति दस लाख ( (ppm) पीपीएम) है। भविष्य में CO2 का स्तर ज्यादा होने कि आशंका है क्यूंकि जीवाश्म ईंधन और भूमि के उपयोग में काफ़ी परिवर्तन आ रहे हैं वृद्धि क दर अनिश्चित आर्थिक, सामाजिक (sociological), तकनीकी और प्राकृतिक घटनाओं पर निर्भर करेगी पर शायद आखिरकार जीवाश्म ईंधन की उपलब्धता ही निर्णायक साबित हो आईपीसीसी की उत्सर्जन परिदृश्‍यों पर विशेष रिपोर्ट (Special Report on Emissions Scenarios) भविष्य के कई CO2 परिदृश्‍यो के बारे में बताती है जो 2100 के आख़िर तक 541 से लेकर 970 पीपीएम तक हो सकते हैं। इस स्तर तक पहुंचने के लिए तथा 2100 के बाद भी उत्सर्जन जारी रखने के लिए जीवाश्म ईंधन के पर्याप्त भंडार हैं, यदि कोयला (coal), बालू रेत (tar sands) या मीथेन क्लेथ्‍रेट (methane clathrate) का व्यापक प्रयोग किया जाता है।

पुननिर्वेशन

जलवायु पर बाध्‍क घटकों के प्रभाव विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा जटिल हो जाते हैं। सर्वाधिक स्पष्ट प्रत्युत्तरों में से एक का संबंध जल के वाष्पीकरण से है। कार्बन डाई ऑक्साइड जैसी दीर्घकालीन ग्रीनहाउस प्रभाव वाली गैसों के मिलने से पैदा होने वाली गर्मी वायुमंडल में जल के अधिक मात्रा में वाष्‍पीकरण का कारण बनता है। क्यूंकि जल-वाष्प ख़ुद एक ग्रीनहाउस गैस है, इसलिए इससे वातावरण और भी ज्यादा गर्म हो जाता है और इससे और बी ज्यादा पानी वाष्प में बदलता है (क सकारात्मक पुननिर्वेशन (positive feedback)) और यह प्रतिक्रिया चलती रहती है जबतक कि पुननिर्वेशन चक्र पर रोक न लग जाए.अकेले कार्बन डाई आक्साइड से होने वाले इसका प्रभाव बहुत विशाल होगा। यद्यपि प्रत्युत्तर की यह प्रक्रिया वायु की नमी के कणों में बढोतरी करती है, तब भी सापेक्ष आर्द्रता (relative humidity) या तो स्थिर रहती है या थोड़ी सी घट जाती है क्योंकि वायु गर्म हो जाती है। प्रत्युत्तर का यह प्रभाव केवल धीरे धीरे ही उल्टा हो सकता है क्योंकि कार्बन डाई आक्साइड में दीर्घकालीन वायुमंडलीय जीवनावधि (atmospheric lifetime) होती है।
बादलों से प्रभावित होने वाले प्रत्युत्तर एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। नीचे से देखा है, बादल को वापस उत्सर्जन अवरक्त विकिरण की सतह और एक इतनी गर्मी प्रभाव डालती है, ऊपर से देखा है, बादल और सूर्य के प्रकाश उत्सर्जन अवरक्त विकिरण प्रतिबिंबित करने के लिए जगह है और इसलिए एक शीतलन प्रभाव डालती है। शुद्ध प्रभाव क्या गर्म अथवा ठंडा है यह बादल की किस्म (type) और उंचाई जैसे विवरणों पर निर्भर करता है। जलवायु के प्रतिमानों पर इन विवरणों को प्रदर्शित करना कठिन होता है क्योंकि जलवायु प्रतिमानों के संगणक खानों पर रिक्त स्थानों के बिंदुओं के बीच की तुलना में बादल बहुत छोटे होते हैं।
जैसे जैसे वायुमंडल गर्म होता जाता है वैसे वैसे परामर्शी प्रत्युत्तर की प्रक्रिया चूक दर (lapse rate) में परिवर्तन से संबंधित होती है।क्षोभमंडल (troposphere) उंचाई में बढोतरी होने के साथ-साथ वायुमंडल का तापमान घटता जाता है। अवरक्त विकिरण का उत्सर्जन तापमान की चौथी शक्ति पर निर्भर करता है, वातावरण की उपरी तह से ज्यादा लम्बी विकिरण (longwave radiation) उत्सर्जित होती है और निचली तह से यह कम होती है। ज्यादातर विकिरण जो उपरी वातावरण से उत्सर्जित होती है खला में चली जाती है, जबकि निचले वातावरण से उत्सर्जित होने वाली विकिरण दोबारा वतावारव द्वारा सोख ली जाती है। इस प्रकार, ग्रीन हाउस प्रभाव वातावरण में तापमान के ऊंचाई के साथ कम होने की रफ़्तार पे निर्भर करता है, अगर तापमान की दर कम है तो ग्रीन हाउस असर ज्यादा होगा और अगर तापमान गिरने की दर कम है तो ग्रीन हाउस असर कम होगा। सिद्धांत और मॉडल दोनों यह संकेत करते हैं कि वार्मिंग से ऊंचाई के साथ तापमान का गिरना कम हो जाएगा, जिससे एक नकारात्मक lapse rate feedback पैदा हो जाएगा और इससे ग्रीन हाउस असर कमज़ोर होगा। ऊंचाई के साथ तापमान परिवर्तन की दर का मापन छोटी-छोटी त्रुटियों के प्रति बहुत सवेंदेंशील होता है, इससे यह पता करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि मॉडल हकीकत से मेल खाता है के नहीं .

एक और महत्वपूर्ण प्रक्रिया है आइस’अल्बेडो प्रत्युत्तर जब वैश्विक तापमान में वृद्धि होती है, तब ध्रुवों के पास बर्फ तेज दर से पिघलने लगती है। जैसे जैसे बर्फ पिघलती है वैसे वैसे भूमि अथवा खुला जल उसका स्‍थ्‍स्थान ले लेता है। भूमि और जल दोनों ही बर्फ की तुलना में कम परावर्तक होते हैं और इसीलिए सौर विकिरण को अधिक मात्रा में सोख लेते हैं। इससे अधिक गर्मी हो जाती है जिसके कारण और अधिक बर्फ पिघलने लगती है तथा यह चक्र चलता रहता है।

सकरामातक पुननिर्वेशन (Positive feedback) जो की CO2 और CH4 के उत्सर्जन के कारण होता है एक अन्य कारण है जो वार्मिंग को बढाता है। यह गैसें जमते हुए पेर्मफ्रोस्त (permafrost) जैसे की जमा हुई लकड़ी (peat), siberia (bog) में दलदल (Siberia) से पैदा होती हैं। इसी तरह मीथेन clathrate (methane clathrate), जो की महासागरों में पाया जाता है, से जो भारी मात्रा में CH4 निकलती है, वार्मिंग का एक मुख्य कारण हो सकती है, जैसा की clathrate gun hypothesis (clathrate gun hypothesis) कहता है।

जैसे जैसे समुद्र गर्म होता जाता है वैसे वैसे कार्बन को अलग करने की क्षमता घटती जाती है। ऐसा इसलिए है क्यूंकि mesopelagic क्षेत्र (mesopelagic zone) (लगभग 200 से 1000 मीटर की गहराई तक) में पोषकों का गिरता हुआ स्तर डायटम (diatom) के विकास में भादक होता है और छोटे phytoplankton (phytoplankton) के हक़ में होता है जो की कार्बन के (biological pump) हैं।

सौर परिवर्तन

पिछले 30 वर्षों से कुछ कागजात सुझाव देते हैं कि सूर्य के योगदान का कम आकलन किया गया है। Duke University (Duke University) के दो शोधकर्ताओं, Bruce West और Nicola Scafetta ने यह अनुमान लगाया है कि सूर्य ने 1900-200 तक शायद 45-50 प्रतिशत तक तापमान बढ़ाने में योगदान दिया है और 1980 और 2000 के बीच में लगभग 25-35 प्रतिशत तक तापमान बढाया है। पीटर स्कॉट और अन्य शोधकर्ताओं द्वारा पता चला है जलवायु मॉडल ग्रीन हाउस गैसों के प्रभाव को जिआदा आंकते हैं और सोलर फोर्सिंग को जिअदा महत्व नहीं देते, वे यह भी सुझाव देते हैं ज्वालामुखी धूल और सुल्फाते एरोसोल्स ओ भी कम आँका गया है फिर भी वे मानते हैं कि सोलर फोर्सिंग होने के बावजूद, जिअदातर वार्मिंग ग्रीन हाउस गैसों के कारण होने की संभावना है, ख़ास कर के 20 वीं सदी के मध्य से लेकर एक अनुमान यह है कि अलग अलग अलग रूपों में सौर निर्गम (solar output), जो की बादलों के बंनने से, जो की गालाक्टिक ब्रह्मांडीय किरणों (galactic cosmic ray) द्वारा बनते हैं, ने भी हाल की वार्मिंग में हिस्सेदारी की है। यह भी सुझाव दिया गया है कि सूर्य में जो चुंबकीय गतिविधि है वह भी ब्रह्मांडीय किरणों को प्रवर्तित करती है जिससे बादलों के संघनन नाभिक प्रभावित होते हैं और जलवायु भी प्रभावित होती है।

सूर्य की गतिविधि का एक असर यह भी होगा की इससे स्ट्रैटोस्फियर (stratosphere) गर्म हो जायेगी, जबकी ग्रीन हाउस गैस सिद्धांत (greenhouse gas theory) वहां पर शीतलन की भविष्यवाणी करता है। यह रुझान देखा गया है 1960 के बाद से लेकर स्ट्रैटोस्फियर ठंडा ही हुआ है।स्त्रतोस्फेरिक ओजोन की कटौती (Reduction of stratospheric ozone) के कारण शीतलता भी पैदा होती है, पर ओजोन रिक्तीकरण 1970 के दशक के अंत तक नहीं हुआ। सौर विभिन्नता और ज्वालामुखी गतिविधि० के कारण औद्योगिक युग से लेकर 1950 तक गर्मी नहीं बढ़ी बल्कि शीतलन ही हुआ है। 2006 में पीटर फौकल और संयुक्त राज्य अमेरिका, जर्मनी और स्विट्ज़रलैंड के अन्य शोधकर्ताओं ने पाया की सूर्य की चमक में पिछले 1000 सालों से कोई (net increase) परिवर्तन नहीं आया है।सौर चक्र (Solar cycle) के कारण पिछले 30 सालों में केवल 0.07 प्रतिशत की ही वृद्धि हुई है। ग्लोबल वार्मिंग के लिए यह बहुत छोटा तथा महत्वपूर्ण योगदान देने वाला प्रभाव है। माइक लोक्क्वूद और क्लाउस फ्रोहलीच के एक शोध ने पाया की 1945 से लेकर अब तक ग्लोबल वार्मिंग और सौर विकिरण में कोई सम्बन्ध नहीं है, चाहे वह सौर उर्जा की बात हो या ब्रह्मांडीय किरणों (cosmic ray) की। Henrik Svensmark (Henrik Svensmark) और Eigil Friis – Christensen (Eigil Friis-Christensen), जो की बादलों को पैदा करने (cloud seeding) के संस्थापक हैं, ने अपने इस अनुमान की आलोचना की है 2007 में एक शोध से पाया गया की पिछले बीस सालों में धरती पर आने वाली ब्रह्मांडीय किरणों और बादलों और तापमान में कोई संभंध नहीं नही।

तापमान में परिवर्तन

हाल में

वाद्य तापमान रिकार्ड (instrumental temperature record) के अनुसार पृथ्वी का तापमान, चाहे वो ज़मीन पर हो या समुद्र में, 1860-1900 के मुकाबले बढ़ा है यह तापमान में वृद्धि शहरी गर्मी द्वीप (urban heat island) प्रभाव से प्रभावित नहीं होता 1079 से, ज़मीन का तापमान समुद्र के तापमान के मुकाबले लगभग दुगना बड़ा है (0.25 °C प्रति दशक बनिस्पत 0.13 °क प्रति दशक) निचले त्रोपोस्फेरे (troposphere) में तापमान 0.12 और 0.22 °C (0.22 और 0.4 °F) के बीच में प्रति दशक बड़ा है, जैसा की उपग्रह के आंकडे बताते हैं . (satellite temperature measurements) यह माना जाता है कि 1850 से पहले पिछले एक या दो हज़ार सालों (one or two thousand years) से तापमान अपेक्षाकृत स्थिर रहा है, कुछ क्षेत्रीये उतार -चडाव जैसे की मध्यकालीन गर्म काल (Medieval Warm Period) या अल्प बर्फीला युग (Little Ice Age) समुद्र में तापमान ज़मीन के मुकाबले धीरे बड़ते हैं क्यूंकि महासागरों की अधिक heat कैपसिटी अधिक होती है और वे वाष्पीकरण से जिआदा गर्मी खो सकते हैं उतरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) में ज़मीन जिआदा है इसलिए वह दक्षिणी गोलार्ध (Southern Hemisphere) की तुलना में जल्दी गर्म होता है उतरी गोलार्ध में मौसमी बर्फ और समुद्री बर्फ के व्यापक इलाके हैं जो की ice-albedo फीडबैक पर निर्भर करते हैं उतरी गोलार्ध में दक्षिणी गोलार्ध के मुकाबले अधिक ग्रीन हाउस गैसें उत्सर्जित की जाती हैं, पर यह गर्मी में अन्तर के लिए जिम्मेदार नहीं है क्यूंकि प्रमुख ग्रीन हाउस गैसें काफ़ी समय तक रहती हैं और दोनों गोलार्धो में अच्छी तरह घुल-मिल जाती हैं।
NASA’s गोद्दर्द अन्तरिक्ष अध्ययन संस्थान (Goddard Institute for Space Studies), के अनुमानों पर आधारित, 2005 सबसे गर्म साल था, जबसे मापन के साधन 1800 के अंत में उपलब्ध हुए तब से, 1998 के रिकॉर्ड को इसने एक डिग्री के कुछ सौवें भाग से तोडा विश्व मौसम विज्ञान संगठन (World Meteorological Organization) और जलवायु अनुसंधान एकक (Climatic Research Unit) द्वारा तैयार किए गए अंदाजों से निष्कर्ष निकाला गया की 2004, 1998 के बाद दूसरा सबसे जिआदा गर्म साल था 1998 में तापमान असामान्य रूप से जिआदा इसलिए था क्यूंकि उस साल अल Niño के दक्षिणी दोलन (El Niño-Southern Oscillation) घटित हुए थे।

Anthropogenic उत्सर्जन के अन्य प्रदूषक -विशेषकर सल्फेट एरोसोल (aerosol) स-ठंडा करने वाला प्रभाव डालते हैं क्यूंकि यह आती हुई सूर्य की रौशनी को प्रतिबिंबित कर देते हैं यह एक आंशिक कारण है उस शीतलन का जो बीसवी सदी के मध्य में पाया गया हालांकि प्रा‍कृतिक परिवर्तनशीलता के कारण भी ठंडापन हो सकता है।जेम्स Hansen (James Hansen) और उनके सहयोगियों ने प्रस्ताव रखा है कि जीवाश्म ईंधन के जलने से जो पदार्थ निकलते हैं -CO2 और एरोसोल्स ने एक दूसरे प्रभाव को खत्म कर दिया है, इसलिए गर्मी जिआदातर गैर CO2 ग्रीनहाउस गैसों के कारण ही है।
Paleoclimatologist विलियम रूडीमेन (William Ruddiman) मानव ने तर्क दिया कि दुनिया भर में जलवायु पर मानवी प्रभाव लगभग 8000 साल पहले शुरू हुआ जब इंसानों ने कृषि के लिए वन साफ़ करने शुरू कर दिए और 5000 साल पहले शुरू हुई एशिया के चावल की सिंचाई ने भी इसमे योगदान दिया Ruddiman की ऐतिहासिक रिकॉर्ड की व्याख्या को मिथेन के आंकड़ों की तुलना में विवादित बताया गया है।

मानव पूर्व जलवायु की भिन्‍नता

पृथ्वी ने पहले भी कई बार गर्मी और सर्दी महसूस की है। हाल ही का अंटार्कटिक EPICA (EPICA) आइस कोर 800000 साल का लेखा-जोखा रखता है, जिसमे आठ ग्लासिअल (interglacial) चक्र परिक्रमण भिन्नरूप (orbital variations) के साथ दिए गए हैं जो वर्तमान तापमानों के साथ तुलना करते हैं।

आरंभिक जुरास्सिक (Jurassic) काल (लग-भाग 180 करोड़ वर्ष पहले) में ग्रीन हाउस गैसों में वृद्धि होने के कारण औसत तापमान 5 °C (9 °F).तक बड़ गए मुक्त विश्वविद्यालय (Open University) के अनुसन्धान से संकेत मिले हैं कि वार्मिंग के कारण चट्टानों की अपक्षय (weathering) दर् 400 प्रतिशत तक बढ़ गई इस तरह से अपक्षय कार्बन को कैल्सीटेट (calcite) और डोलोमाइट (dolomite) में बाँध देती है, CO2 का स्तर अगले 150000 सालों में वापिस आम स्तर तक आया।

मिथेन का clathrate compound (clathrate compound)s (the clathrate gun hypothesis (clathrate gun hypothesis)) से अचानक निकास उन कारणों में से एक माना जाता है जिसके कारण भूतकाल में वार्मिंग हुई, इसमे Permian–Triassic extinction event (Permian–Triassic extinction event) (लग-भाग 2 करोड़ 51 लाख साल पहले) और the Paleocene–Eocene Thermal Maximum (Paleocene–Eocene Thermal Maximum) (लग-भाग 55 करोड़ साल पहले).

जलवायु प्रतिमान

2001 या उससे पहले की गई 21 वीसदी के दौरान सतह की गर्मी का वैज्ञानिकों ने जलवायु के कंप्यूटर मॉडल (computer models) सहित ग्‍लोबल वार्मिंग का अध्‍ययन किया है। ये मोडल्स द्रव गतिशीलता के भौतिक सिद्धांतों, विकरणशील हस्तांतरण (radiative transfer) और अन्य प्रक्रियाओं पर आधारित हैं, कटी जगाहाओं पर सरलीकरण किया गया है क्यूंकि कंप्यूटर की अपनी सीमाएं होती हैं और जल्यायु प्रणाली बहुत ही जटिल (complexity) है सरे आधुनिक जलवायु मॉडल अपने में एक वतावार्नेय मॉडल लिए होते हैं और यह समुद्र के मॉडल और भूमि तथा समुद्र पर बर्फ के मॉडल के साथ जुदा होता है कुछ मॉडलों में रासायनिक और जैविक प्रक्रियाओं के उपचार भी शम्मिल होते हैं यह मॉडल पता लगाते हैं कि ग्रीनहाउस गैसों का प्रभाव अगर जोड़ा जाए तो एक गर्म जलवायु प्राप्त होती है फिर भी, जब ये धारणा इस्तेमाल की जाती है तो भी जलवायु संवेदनशीलता (climate sensitivity) का बहुत बड़ा रोल रहता है।

ग्रीनहाउस गैसों की सांद्रता में भविष्य की अनिश्चितताओं को ध्‍यान में रखते हुए आईपीसीसी 21 वी सदी के अंत तक अक चेतावनी की परिकल्पना करती है, 1980 -1999 के मुकाबले मॉडल का इस्तेमाल हाल के जलवायु परिवर्तन के कारणों (causes of recent climate change) की जांच करने के लिए भी किया गया है, इसके लिए मापे हुए परिवर्तनों की तुलना मॉडल के द्वारा बताये गए परिवर्तनों के साथ की जाती है।

जलवायु के वर्तमान मॉडल अवलोकन के साथ अच्छी तरह मेल खाते हैं पर जलवायु के सभी पहलुओं की नक़ल नहीं कर पाते ये माडल उस वार्मिंग जो की 1910 से 1945 तक हुई थी को अच्छी तरह समझा नहीं पाते, की वह प्राकृतिक परिवर्तन या मानव प्रभाव के कारण हुई ; फिर भी, वे यह सुझाव देते हैं कि 1975 के बाद से होने वाली वार्मिंग ग्रीन हाउस गैसों (greenhouse gas) के उत्सर्जन के कारण ही है

वैश्विक जलवायु मॉडल के अनुमान उन ग्रीनहाउस गैस परिदृश्यों से प्रभावित होते हैं जिनको आईपीसीसी (उत्सर्जन पर विशेष रिपोर्ट (Special Report on Emissions Scenarios)) (SRES) ने अपनी रिपोर्ट में दर्शाया है चाहे सामन्य न हो पर मॉडल में कार्बन चक्र (carbon cycle) का अनुकरण भी किया जाता है, यह ज्यादातर सकारात्मक प्रतिक्रिया दर्शाता है, चाहे यह प्रतिक्रिया (A2 SRES परिदृश्य के अंतर्गत, प्रतिक्रियाओं में 20 और 200 पीपीएम CO2 का अन्तर होता है) अनिश्चित है कुछ पर्यवेक्षण अध्ययनों से एक सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली है।

मई 2008 में यह भविष्यवाणी की गई की ” विशव का तापमान चाहे अगले दशक में न बड़े क्यूंकि उत्तरी अटलांटिक और प्रशांत उष्णकटिबंधीय क्षत्रों में जो जलवायु परिवर्तन होंगे वे अस्थायी तौर पर अन्थ्रोपोगेनिक वॉर्मिंग को कम कर देंगे ” यह भविष्यवाणी समुद्र के तापमान की गणना पर आधारित था।

वर्तमान पीढ़ी के मॉडल में बादलों को दर्शाया जाना अनिश्चितता का एक बड़ा कारण है, यद्यपि इस पर कार्य किया जा रहा है।

हाल के एक अध्ययन के द्वारा दाऊद डगलस (David Douglass), जॉन क्रिस्टी (John Christy) और बिन्यामीन Pearson और फ्रेड गायक (Fred Singer) ने पाया की अगर हम वास्तविक जलवायु मॉडलों के साथ 22 प्रमुख वैश्विक जलवायु मॉडलों की तुलना करें तो यह पाया जाता है कि यह उष्णकटिबंधीय troposphere में हुए परिवर्तनों पर खरे नहीं बैठते .लेखक इस बात पर गौर करते हैं कि उनकी परिणाम हाल ही में हुए प्रकाशनों के परिणामो से मेल नहीं खाता।

अपेक्षित एवं आशातीत प्रभाव

यद्यपि विशेष मौसम घटनाओं को ग्लोबल वार्मिंग के साथ जोड़ना मुश्किल है, फिर भी विश्व के तापमान में वृद्धि से व्यापक परिवर्तन (changes) सहित बर्फ पीछे हटना (glacial retreat), आर्कटिक shrinkage (Arctic shrinkage) और दुनिया भर में समुद्र के स्तर वृद्धि (sea level rise) हो सकती है।अवक्षेपण (precipitation) की मात्र में परिवर्तन बाढ़ और सूखे (drought) को जनम दे सकता है। चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति एवं त्रीवता में भी परिवर्तन हो सकते (extreme weather) है। अन्य प्रभावों में कृषि पैदावार में कमी, अलावा व्यापार के नए मार्गों का जुड़ना, छोटी गर्मियां, streamflow (streamflow), प्रजातियों का ख़तम (extinctions) होना और रोगों के वेक्टर (disease vectors) में वृद्धि शामिल हैं

प्राकृतिक वातावरण (natural environment) और मानव जीवन (human life) पर कुछ असर कुछ हद तक ग्लोबल वार्मिंग की वजह से माने जा रहे हैं IPCC की एक रिपोर्ट के अनुसार glacier का पीछे हटना (glacier retreat), ice shelf का ख़तम होना (ice shelf disruption) जैसा की Larsen Ice Shelf (Larsen Ice Shelf), में हुआ समुद्र के स्टार का बड़ना (sea level rise), बारिश में परिवर्तन और बहुत ही ख़राब मौसम (extreme weather events), ग्लोबल वार्मिंग के कारण माने जा रहे हैं समग्र पैटर्न, तीव्रता और आवृत्ति के लिए परिवर्तन संभावित हैं, यह कहना मुश्किल है कि यह सब ग्लोबल वार्मिंग के कारण है। अन्य प्रभावों में शामिल हैं कुछ क्षेत्रों में पानी की कमी, कुछ में अवक्षेपण का बड़ना, पर्वत snowpack में परिवर्तन और गरम मौसम के कारण और स्वास्थ्य के प्रतिकूल प्रभाव बढ़ती हुई मौतों, displacements और आर्थिक नुकसान, जो की अतिवादी मौसम (extreme weather) के कारण संभावित हैं, बढती हुई जनसँख्या (growing population) के कारण और भी बदतर हो सकते हैं। हालांकि शीतोष्ण क्षेत्र में इसके कुछ फैदे भी हो सकते हैं जैसे की ठंड की वजह से कम मौतें होना . आईपीसीसी तीसरी मूल्यांकन रिपोर्ट (IPCC Third Assessment Report) के लिए द्वितीय कार्यकारी समूह द्वारा . बनाई गई रिपोर्ट में संभावित प्रभाव की समझ और इनका सारांश पाया जा सकता है। नई IPCC Fourth Assessment Report (IPCC Fourth Assessment Report) के अनुसार, ऐसा प्रमाण मिलता है कि उतरी प्रशांत महासागर में 1970 से tropical cyclone (tropical cyclone) की तेज़ गतिविधि पाई गई है Atlantic Multidecadal Oscillation (Atlantic Multidecadal Oscillation)), के संध्र्ब में, पर लम्बी दूरी के प्रभावों का पता लगना, ख़ास कर के उपग्रह गणनाओं से पहले, बहुत मुश्किल है सारांश यह भी स्पष्ट नहीं करता की उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की दुनिया भर में वार्षिक संख्या में कोई सम्बन्ध है या नही.

कुछ और संभावित असर हैं समुद्र का 1990 से 2100 के बीच बढ़ना, खेती पर असर (repercussions to agriculture), thermohaline सिर्कुलेशन का धीमा होना (possible slowing of the thermohaline circulation), ओजोन परत (ozone layer) में कमी चक्रवातों और ख़राब मौसम की (hurricanes and extreme weather events) तीव्रता में इजाफा (पर यह देर बाद आएँगे), महासागर pH (lowering) का नीचा होना (pH) और मलेरिया और dengue बुखार जैसी बिमारियों का फैलना . एक अध्ययन की भविष्यवाणी के अनुसार 2040 तक 18% से 35% पशु और पौधों की प्रजातियाँ विलुप्त (extinct) हो जाएँगी, यह बात 1103 पशु और पौधों के एक नमूने पर आधारित है लेकिन, कुछ ही यंत्रवत अध्ययनों ने जलवायु परिवर्तन के कारण जीवों विलुप्त होने का अनुमान लगाया है और एक शुद्ध तो यह दर्शाता है कि विलुप्त होने का अनुमान अनिश्चित हैं।

ग्लोबल वार्मिंग कसे भौगोलिक क्षमता तथा उसकी प्रचंडता में वृद्धि होने की आशा है। उष्णकटिबंधीय बीमारियां (tropical disease) संपूर्ण यूरोप, उत्तरी अमरीका तथा उत्तरी एशिया में जलवायु परिवर्तन कीड़ो से पैदा होने वाले रोगों में बढोतरी कर सकता है जैसे मलेरिया.

सामाजिक और राजनीतिक बहस

वैज्ञानिक निष्कर्ष के प्रचार के कारण दुनिया में राजनीतिक और आर्थिक बहस चिद गई है। गरीब क्षेत्रों, खासकर अफ्रीका, पर बड़ा जोखिम दिखाई देता है जबकि उनके उत्सर्जन विकसित देशों की तुलना में काफी कम रहे हैं। इसके साथ ही, विकासशील देश (developing country) की क्योटो प्रोटोकॉल (Kyoto Protocol) के प्रावधानों से छूट संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया, द्वारा नकारी गई है और इसको अमेरिका के अनुसमर्थन का एक मुद्दा बनाया गया है। पश्चिमी दुनिया (Western world) में संयुक्त राज्य अमेरिका की तुलना में है। की तुलना में यूरोप में यह विचार की मानव का जलवायु पर बहुत प्रभाव पड़ता है जिआदा बलवान है।

जलवायु परिवर्तन का मुद्दा एक नया विवाद ले आया है कि ग्रीनहाउस गैस (greenhouse gas) के औद्योगिक (industrial)उत्सर्जन (emissions) ओ कम करना फाइदेमंद है या उस पर होने वाला खर्च (costs) जिअदा नुकसानदेह है कई देशों में चर्चा की गई है कि वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों (alternative energy sources) को अपनाने में कितना खर्च आएगा और उसका कितना लाभ होगा.प्रतियोगी Enterprise संस्थान (Competitive Enterprise Institute) और ExxonMobil (ExxonMobil) जैसी कम्पनिओं ने यह कहा है कि हमें जलवायु की जिअदा बुरी हालत की कल्पना कर के ऐसे कदम नहीं उठाने हैं जो बहुत जिअदा खर्चीले हों. इसी तरह, पर्यावरण की विभिन्न सार्वजनिक लॉबी और कई लोगों ने अभियान शुरू किए हैं जो जलवायु परिवर्तन का जोखिम (risks of climate change) पर ज़ोर डालते हैं और कड़े नियंत्रण करने की वकालत करते हैं। जीवाश्म ईंधन की कुछ कंपनियों ने अपने प्रयासों को हाल के वर्षों में कम किया है यां ग्लोबल वार्मिंग के लिए नीतियों की वकालत की है।

विवाद का एक और मुद्दा है कि उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं (emerging economies) जैसे भारत और चीन से कैसी उम्मीद की जानी चाहिए की वेह अपने उत्सर्जन को कितना कम करें। हाल की रिपोर्ट के अनुसार, चीन के सकल राष्ट्रीय CO 2 < / उप > उत्सर्जन (gross national CO2 emissions) अमरीका से जिअदा हो सकते हैं, पर चीन ने कहा है कि प्रति व्यक्ति उत्सर्जन (per capita emissions) अमरीका से पाँच गुना कम है इसलिए उस पर यह बंदिश नहीं होनी चाहिए भारत ने भी इसी बात को दोहराया है जिसे क्‍योटो प्रतिबंधों से छूट प्राप्त है और जो औद्योगिक उत्सर्जन का सबसे बड़ा स्रोत है।

जलवायु संबंधित मुद्दे

ग्लोबल वार्मिंग के संबंध में अक्सर कई तरह के मुद्दे उठाए जाते हैं। इनमें से एक महासागरीय अम्लीकरण है। (ocean acidification) वातावरण में बढ़ती CO2 CO की मात्रा से CO 2 की मात्रा महासागरों में भी बड़ जाती है। CO2 समुद्र में पानी के साथ प्रतिक्रिया करता है और कार्बोनिक एसिड (carbonic acid), बनाता है जिससे अम्लीकरण में वृद्धि होती है महासागर की सतह का पीएच (pH) अनुमान है कि 2004 तक 8.14 ही रह गया है जब की औद्योगिक युग की शुरुआत में यह 8.25 था इसके और भी ज्यादा घटने के आसार हैं, 2100 तक यह 0.14 से 0.5 तक कम हो सकता है क्‍योंकि महासागर और ज्यादा CO2। सोख लेंगे. चूंकि जीवधारी हैं और पारितंत्रों ने अपने आप को कम pH पर ढाला है, इससे उनके विलुप्त होने (extinction) का ख़तरा बढ़ गया है, CO2 का बढ़ना खाद्य जालियाँ (food webs) और मनाव समाज, जो की समुद्र पर निर्भर करता है, को खतरे में दाल सकता है।

धरती पर प्रकाश के आने ने, जिसको irradiance (irradiance) कहते हैं हो सकता हिया की 20 वे दशक में ग्लोबल वार्मिंग (Global dimming) को कम किया हो, क्यूंकि तब कम प्रकाश धरती पर आया था 1960 से 1990 तक मानव निर्मित एरोसोल्स ने इस असर को और भी बढाया वैज्ञानिकों ने कहा है कि 66-90 प्रतिशत विश्‍वास के साथ कहा है कि मानव निर्मित एरोसोल्स, ज्वालामुखी गतिविधि सहित ग्लोबल वार्मिंग को कुछ कम करते हैं और ग्रीनहाउस गैसें वार्मिंग को अभी तक जितना देखा गया है उससे और अधिक बढ़ाएँगी यदि ये कम करने वाले कारक न हो।

ओजोन रिक्तीकरण (Ozone depletion) जिसमे पृथ्वी की स्ट्रैटोस्फियर (stratosphere) में ओजोन की कमी हो जाती है, ने ग्लोबल वार्मिंग को बढावा दिया है यद्यपि इन क्षेत्रों के संबंध (areas of linkage) हैं, पर दोनों के बीच के संबंध को मजबूत नहीं कहा जा सकता .

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