एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन भाग – 2

आई. पी. एम. कैसे ?
बीज के चयन तथा बीजाई से लेकर फसल की कटाई तक विभिन्न विधियां , जो प्रयोग समयानुसार एवं क्रमानुसार आई. पी.एम. विधि में अपनाई जाती है, इस प्रकार हैं:-

  1. व्यवहारिक नियन्त्रण
  2. यांत्रिक नियन्त्रण
  3. अनुवांशिक नियन्त्रण
  4. संगरोध नियन्त्रण
  5. जैविक नियन्त्रण
  6. रासायनिक नियन्त्रण

व्यवहारिक नियन्त्रण
व्यवहारिक नियन्त्रण से तात्पर्य है कि परम्परागत अपनाए जाने वाले कृषि क्रियाओं में ऐसा क्या परिवर्तन लाया जाए, जिससे कीड़ों तथा बिमारियों से होने वाले आक्रमण को या तो रोका जाए या कम किया जाए। या विधियां हमारे पूर्वजों से चली आ रही है लेकिन आधुनिक रासायनों के आने से इनका प्रयोग कम होता जा रहा है। इसके अंतगर्त निन्मलिखित तरिके अपनाएं जाते है:-
खेतों से फसल अवशेषों का हटाना तथा मेढ़ों को साफ रखना।
गहरी जुताई करके उसमें मौजूदा कीड़ों तथा बिमारियों की विभिन्न अवस्थओं तथा खरपतवारों को नष्ट करना।
खाद तथा अन्य तत्वों की मात्रा निर्धारिण के लिए मिट्टी परिक्षण करवाना।
साफ, उपयुक्त एवं प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना तथा बोने से पहले बीज उपचार करना।
उचित बीज दर एवं पौध अन्तरण।
पौधारोपण से पहले पौधें की जड़ो को जैविक फफंूदनाशक ट्राइकोडरमा बिरडी से उपचारित करे।
फसल बीजने और काटने का समय इस तरह सुनिशिचित करना ताकि फसल कीड़ो तथा बीमारियों के प्रमुख प्रकोप से बचे सके।
पौधें की सही सघनता रखे ताकि पौधे स्वस्थ रहे।
समुचित जल प्रबन्धन
उर्वरक प्रबन्धन अर्थात उर्वरक की सही मा़त्रा उचित समय पर देना। फसल की समय से उचित नमी में सन्तुलित खाद व बीज की मात्रा डाले ताकि पौधे प्रारम्भिक अवस्था में स्वस्थ रह कर खरपतवारों से आगे निकल सके।
फसल चक्र अपनाना अर्थात एक ही फसल को उसी खेत में बार बार न बीजना। इससे कई कीड़ो तथा बीमारियों का प्रकोप कम हो जाता है।
स्मकालिक रोपण।
खरपतपार का समुचित प्रबन्ध करना। यह पाया गया है कि बहुत से खरपतवार कई तरह की बीमारियों तथा कीडों को संरक्षण देते हैं।
बीजाई के 45 दिनों तक खेतों से खरपतवारों को फूल आने की अवस्था से पहले ही निकाल दें।
यांत्रिक नियन्त्रण
इस विधि को फसल रोपाई के बाद अपनाना आवश्यक है। इसके अंतर्गत निम्न तरिकें अपनाएं जाते है:-
कीड़ों के अण्ड समूहों, सूडियों, प्यूपों तथा वयस्कों को इकट्ठा करके न्ष्ट करना। रोगग्रस्त पौधों या उनके भागों को नष्ट करना।
खेत में बांस के पिंजरे लगाना तथा उनमें कीड़ो के अण्ड समूहों को इकट्ठा करके रखना ताकि मित्र कीटों का संरक्षण तथा हानिकारक कीटों का नाश किया जा सके।
प्रकाश प्रपंच की सहायता से रात को कीड़ो को आकर्षित करना तथा उन्हें नष्ट करना।
कीड़ो की निगरानी व उनको आकर्षित करने के लिए फिरामोन ट्रेप का प्रयोग करना तथा आकर्षित कीड़ो को नष्ट करना।
हानिकारक कीट सफेद मक्खी व तेला के नियन्त्रण के लिए यलो स्टिकी ट्रेप का प्रयोग करे।
अनुवांशिक नियन्त्रण
इस विधि से नर कीटों में प्रयोगशाला में या तो रासायनों से या फिर रेडिऐशन तकनिकी से नंपुसकता पैदा की जाती है और फिर उन्हें काफी मात्रा में वातावरण में छोड़ दिया जाता है ताकि वे वातावरण में पाए हाने वाले नर कीटों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें। लेकिन यह विधि द्वीप समूहों में ही सफल पाई जाती है।
संगरोध नियन्त्रण
इस विधि में सरकार के द्वरा प्रचलित कानूनों को सख्ती से प्रयोग में लाया जाता है जिसके तहत कोई भी मनुष्य कीट या बीमारी ग्रस्त पौधों को एक स्थान से दूसरे स्थानों को नहीं ले जा सकता। यह दो तरह का होता है जैसे घरेलू तथा विदेशी संगरोध।
जैविक नियन्त्रण
जैव नियन्त्रणः
फसलों के नाशीजीवों (pests) कों नियन्त्रित करने के लिए प्राकृतिक शत्रुओं को प्रयोग में लाना जैव नियन्त्रण कहलाता है।
नाशीजीव फसलों को हानि पहुँचाने वाले जीव नाशीजीव कहलाते है।
प्राकृतिक शत्रुः प्रकृति में मौजूद फसलों के नाशीजीवों के नाशीजीव ‘प्राकृतिक शत्रु’, ‘मित्र जीव’, ‘मित्र कीट’, ‘किसानों के मित्र’, ‘वायो एजैेट’ आदि नामों सें जाने जोते हैं।
जैव नियन्त्रण एकीकष्त नाशीजीव प्रबधन का महत्वपूर्ण अंग है। इस विधि में नाशीजीवी व उसके प्राकृतिक शत्रुओ के जीवनचक्र, भोजन, मानव सहित अन्य जीवों पर प्रभाव आदि का गहन अध्ययन करके प्रबन्धन का निर्णय लिया जाता है।
जैव नियन्त्रण के लाभ
जैव नियन्त्रण अपनाने से पर्यावरण दूषित नहीं होता है।
प्राकृतिक होने के कारण इसका असर लम्बे समय तक बना रहता है।
अपने आप बढ़ने (गुणन) तथा अपने आप फैलने के कारण इसका प्रयोग घनी तथा ऊँची फसलों जैसे गन्ना, फलादार पौधों, जंगलों आदि में आसानी से किया जा सकता है।
केवल विशिष्ट नाशीजीवों पर ही आक्रमण होता है अतः अन्य जीव प्रजातियों, कीटों, पशुओं, वनस्पतियों व मानव पर इसका काई प्रभाव नहीं होता है।
अवशिष्ट प्रभाव नहीं होता है अतः फसल उपयोग के लिए काई प्रतीक्षा समय नहीं होता है।
इनका उपयोग सस्ता होता है।
किसान अपने घर पर भी इनका उत्पादन कर सकते हैं।

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