नाभिकीय ईंधन एवं संरचनात्मक घटक

देश के संपूर्ण परमाणु विद्युत कार्यक्रम हेतु नाभिकीय ईंधन के संयोजन और महत्वपूर्ण संरचनात्मक घटकों के निर्माण हेतु नाभिकीय ईंधन सम्मिश्र (एन एफ सी) की स्थापना हैदराबाद में 70 के दशक के प्रारंभ में की गई थी।
एन एफ सी के क्रियाकलापों का विवरण निम्नलिखित है :-
बिहार और केरल से प्राप्त यूरेनियम अयस्क सांद्रित्र तथा धातु जिर्कोन रेत का स्वदेश में विकसित श्रंखलाबद्ध रासायनिक और धात्विक प्रक्रियाओं द्वारा संसाधन।
ऊष्ण बहिर्वेधन एवं शीतल पिलगरिंग प्रक्रिया द्वारा स्टैनलेस स्टील, कार्बन स्टील, टिटैनियम तथा निकेल, मौग्नीशियम की अन्य मिश्र धातुओं की सीवनहीन ट्र्यूबों का निर्माण।
180 मिली मीटर व्यास वाली उष्ण बहिर्वेधन ट्यूबों और 4.5 मिलीमीटर पतली दीवार वाली शीतल पिलगर्ड ट्यूबों का नियमित रूप से निर्माण कार्य।
एन.एफ.सी. द्वारा अपनी अर्जित विशेषज्ञता का लाभ भारतीय नौसेना, हिंदुस्तान एरोनाटिक्स लिमिटेड तथा अन्य रक्षा संगठनों तथा रसायनिक, खाद और यांत्रिक बॉल बियरिंग का निर्माण करनेवाले उद्योगों तथा अन्य अनेक रासायनिक उपकरण विनिर्माताओं को प्रदान किया जाता है।
एन.एफ.सी. के अन्य उत्पादनों में टैन्टलम, नियोबियम, रजत और ग्राहकों के विनिर्देशों के अनुसार विभिन्न उच्च शुद्धता वाली सामग्री शामिल हैं।
भारतीय बाजार में अपने उत्पादकों की आपूर्ति करने के अलावा एन.एफ.सी. ने हाल ही में अपने कुछ उत्पादों उदाहरणार्थ : जर्कोनियम छडों और एनहाइड्रस मौग्नीशियम क्लोराइड का निर्यात भी किया है।

नाभिकीय ईंधन चक्र का पश्च्यंत (backend)

नाभिकीय विद्युत उत्पादन कार्यक्रम – नाभिकीय ईंधन चक्र का अग्रांत (front end)
यूरेनियम का खनन, पृथक्करण, रसायनिक शुद्धीकरण, उपयुक्त रूप में परिवर्तन और ईंधन छड़ का निर्माण
नाभिकीय विद्युत उत्पादन कार्यक्रम – नाभिकीय ईंधन चक्र का पश्च्यंत
भुक्तशेष ईंधन का पुनर्संसाधन, विखण्ड्य उर्वर घटकों का पृथक्करण, उचित उपचार क्रिया के बाद विकिरण सक्रिय अपशिष्ट का निरापद निपटान।
नाभिकीय ईंधन चक्र का पश्च्यंत उसकी संवेदनशीतला और सुरक्षा दोनों ही दृष्टियों से एक महत्वपूर्ण क्रिया है। पूर्ण रूप से स्वदेश में किए गए अनुसंधान एवं विकास प्रयासों द्वारा ही ईंधन पुनर्संसाधन प्रौद्योगिकी का विकास और मानकीकरण किया गया था। भुक्तशेष ईंधन से प्लूटोनियम निकालने के लिए तीन पुनर्संसाधन संयंत्रों का क्रमश: ट्राम्बे, तारापुर और कल्पाक्कम में शीत कमीशनन किया गया था।
कल्पाक्कम संयंत्र में अनेक नवीन प्रक्रियाएं समाविष्ट की गई हैं जैसे :
सर्वो-परिचालकों के प्रयोग द्वारा उष्म कोशिकाओं में हाइब्रिड अनुरक्षण की अवधारणा।
संयंत्र की आयु बढ़ाने के लिए प्रावधान किए गए। यह संयंत्र एम.ए.पी.एस. तथा एफ.बी.टी.आर. से प्राप्त ईंधन के पुनर्संसाधन संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करेगा। प्रक्रिया कार्य के इस हिस्से में ईंधन चक्र में उत्पादित अत्यंत रेडियो एक्टिव अपशिष्ट की सुदक्ष हैंडलिंग, सुरक्षित प्रबंधन तथा उपयुक्त निपटान कार्य को उच्च प्राथमिकता दी जाती है।
अपशिष्ट को सुरक्षित हैंडलिंग एवं निपटान के लिए स्वदेशी अनुसंधान एवं विकास कार्य द्वारा विकसित प्रौद्योगिकी कड़े नियामक मानकों पर आधारित है।
सभी नाभिकीय बिजली संयंत्र स्थलों पर स्थापित अपशिष्ट संसाधन संयंत्र प्रचालनरत हैं।
अपशिष्ट प्रबंधन हेतु निम्नलिखित अनुसार दीर्घ-कालिक कार्य योजना प्रतिपादित की गई है :-
ग्लास मौट्रिक्स में काचन द्वारा अचलीकृत किए गए उच्च स्तरीय अपशिष्ट को संक्षारणरोधी कनिस्तरों में उनके डबल एनकैपसुलेशन के बाद उसे इंजीनियरीकृत भण्डारण सुविधा में पृथक रूप से भंडारित किया जाता है जिसमें 20-30 वर्षों तक लगातार शीतलन की सुविधा उपलब्ध रहती है। इसके बाद अंतिम निपटान अतिरिक्त संरक्षण अवरोधकों के साथ भूमि के अन्दर गहराई में किया जाता है।
मध्यम स्तर के अपशिष्टों को उचित उपयुक्त मौट्रिक्स में ठोस रूप में परिवर्तित करने के बाद रिसावरहित पात्रों में भण्डारित किया जाता है और उन्हें पर्याप्त सुरक्षाकवर वाले जलरोधी कंक्रीट टाइल से बने विवरों में दफन किया जाता है।

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