प्रकाश-संश्लेषण एवं श्वसन में सम्बन्ध, आइए जाने

प्रकाश-संश्लेषण एवं श्वसन की क्रियाएँ एक दूसरे की पूरक एवं विपरीत होती हैं। प्रकाश-संश्लेषण में कार्बन डाइ-ऑक्साइड और जल के बीच रासायनिक क्रिया के फलस्वरूप ग्लूकोज का निर्माण होता है तथा ऑक्सीजन मुक्त होती है। श्वसन में इसके विपरीत ग्लूकोज के ऑक्सीकरण के फलस्वरूप जल तथा कार्बन डाइ-ऑक्साइड बनती हैं।

Click for Latest News Updates: News in Hindi

प्रकाश-संश्लेषण एक रचनात्मक क्रिया है इसके फलस्वरूप सजीव के शुष्क भार में वृद्धि होती है। श्वसन एक नासात्मक क्रिया है, इस क्रिया के फलस्वरूप सजीव के शुष्क भार में कमी आती है। प्रकाश-संश्लेषण में सौर्य ऊर्जा के प्रयोग से भोजन बनता है, विकिरण ऊर्जा का रूपान्तरण रासायनिक ऊर्जा में होता है। जबकि श्वसन में भोजन के ऑक्सीकरण से ऊर्जा मुक्त होती है, भोजन में संचित रासायनिक ऊर्जा का प्रयोग सजीव अपने विभिन्न कार्यों में करता है। इस प्रकार ये दोनों क्रियाएँ अपने कच्चे माल के लिए एक दूसरे के अन्त पदार्थों पर निर्भर रहते हुए एक दूसरे की पूरक होती हैं।

श्वसन एवं पोषण में सम्बंध

सजीवों के शरीर में प्रत्येक कोशिका में जैव-रासायनिक क्रियाएँ होती रहती हैं। इन क्रियाओं के सम्पादन हेतु दैनिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा का मुख्य स्रोत भोजन है। सौर ऊर्जा भोजन में स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित रहती है। श्वसन क्रिया में श्वसन का मुख्य पदार्थ ग्लूकोज का ऑक्सीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति में पूर्ण या अपूर्ण ऑक्सीकरण होता है, जिसके फलस्वरूप भोजन में संचित स्थितिज ऊर्जा गतिज ऊर्जा के रूप में मुक्त होता है, जिससे जीवन की दैनिक क्रियाओं के सम्पादन हेतु आवश्यक ऊर्जा का उन्मोचन तथा पूर्ति होती है। श्वसन में ऑक्सीकरण के लिए आवश्यक ग्लूकोज, पोषण के मध्य ही निर्मित होता है। पोषण के लिए आवश्यक ऊर्जा, श्वसन क्रिया में उत्पन्न ऊर्जा से प्राप्त होती है। इस प्रकार श्वसन तथा पोषण एक-दूसरे से अभिन्न रूप से सम्बन्धित है।

श्वसन का जैवविकास

कोशिकीय श्वसन के द्वारा एटीपी निर्माण के लिए अधिकांश सजीव श्वसन की वातपेक्षी विधि पर निर्भर हैं परन्तु क्रम-विकास के दौरान पहले वातनिरपेक्षी श्वसन का विकास हुआ था। वातनिरपेक्षी श्वसन के सर्वप्रथम विकसित होने का कारण पृथ्वी के वायुमंडल में आक्सीजन गैस की अनुपलब्धता थी। 4.6 बिलियन वर्ष पहले पृथ्वी के वायुमंडल में मुख्य गैसें कार्बन डाइ-ऑक्साइड, नाइट्रोजन, जल वाष्प एवं हाइड्रोजन सल्फाइड थीं। इसी वातावरण में 3.5 बिलियन वर्ष पहले प्रथम कोशिकीय सजीव की उत्पत्ति हुई। ये प्रोकैरियोट्स थे। इनकी कोशिकीय संरचना अत्यन्त सरल थी। चूंकि वातावरण में स्वतंत्र आक्सीजन नहीं था इसलिए इन सजीवों में श्वसन की वातनिरपेक्षी प्रक्रिया का विकास हुआ जिसके लिए आक्सीजन की आवश्यकता नहीं पड़ती है। इसके बाद करीब १ बिलियन वर्ष तक यही प्रोकैरियोट्स पृथ्वी पर राज करते रहे। इनमें अपना भोजन स्वयं बनाने के लिए प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया होती थी। प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया में सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाई-आक्साइड और जल की सहायता से कार्बोहाइड्रेट का निर्माण होता है तथा आक्सीजन गैस मुक्त होती है। इस मुक्त हुए आक्सीजन का परिमाण धीरे-धीरे वातावरण में बढ़ने लगा। आक्सीजन की उपस्थिति में सजीव कोशिकाओं में श्वसन की एक नई विधि का विकास हुआ जिसमें अधिक एटीपी उत्पन्न हो सकती थी। इस विधि (वातपेक्षी विधि) के द्वारा कोशिकाएँ पहले से अधिक ऊर्जा उत्पन्न करने लगीं। इससे उनका आकार बढ़ने लगा एवं सरल प्रोकैरियोट्स से जटिल यूकैरियोटिक जीवों का क्रम-विकास हुआ। इन्हीं यूकैरियोटिक जीवों से वर्तमान समय के शैवाल, कवक, पादप एवं जन्तुओं का विकास हुआ है जिनमें कोशिकीय श्वसन अत्यन्त विकसित है। यदि कोशिकीय श्वसन का जैव-विकास नहीं हुआ होता तो शायद आज भी प्राचीन प्रोकैरियोटिक जीवों का धरती पर राज होता।

महत्त्व

वातावरण में संतुलन
प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया में पौधे प्रकाश की उपस्थिति में वातावरण से कार्बन डाई-ऑक्साइड को ग्रहण करते हैं तथा ऑक्सीजन गैस वातावरण में मुक्त करते हैं। जिससे वातावरण में ऑक्सीजन की सान्द्रता का बढ़ जाना तथा कार्बन डाई-ऑक्साइड का कम होना स्वाभाविक होता है, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं होता है। श्वसन की क्रिया में सजीव दिन और रात हर समय ऑक्सीजन गैस ग्रहण करते हैं तथा कार्बन डाई-ऑक्साइड गैस का वातावरण में त्याग करते हैं। इस प्रकार श्वसन क्रिया द्वारा वातावरण में ऑक्सीजन एवं कार्बन डाई-ऑक्साइड गैसों का संतुलन बना रहता है।
ऊर्जा की मुक्ति
श्वसन एक ऊर्जा-उन्मोचन प्रक्रिया है। श्वसन की क्रिया में भोज्य पदार्थों का ऑक्सीकरण होता है, जिससे उनमें संचित ऊर्जा मुक्त होती है। श्वसन के समय मुक्त ऊर्जा का कुछ भाग कोशिका के माइटोकॉन्ड्रिया में एटीपी के रूप में संचित हो जाती है। एटीपी के रूप में संचित यह ऊर्जा भविष्य में सजीव जीवधारियों के विभिन्न जैविक क्रियायों के संचालन में प्रयुक्त होती है। मुक्त होनी वाली ऊष्मीय ऊर्जा सजीवों के शरीर के तापक्रम को संतुलित बनाए रखने में सहायता करती है। कुछ कीटों तथा समुद्री जंतुओं के शरीर से प्रकाश उत्पन्न होता है। यह प्रकाश श्वसन द्वारा उत्पन्न ऊर्जा का ही एक रूपान्तरित रूप है। कुछ समुद्री जीवों जैसे- इलेक्ट्रिक-रे मछली तथा टारपीडो आदि का शरीर आत्म-रक्षा के लिए विद्युतीय तरंगे उत्पन्न करता है, यह विद्युत श्वसन द्वारा उत्पन्न ऊर्जा के रूपान्तरण से उत्पन्न होता है।

Leave a Comment